यशपाल समिति 1992 (Yashpal Committe 1992)

यशपाल समिति 1992 (Yashpal Committe 1992)

भारत सरकार द्वारा सन् 1992 में प्रोफेसर यशपाल कपूर के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर यशपाल कपूर को बनाया गया था। इसलिए इस समिति का नाम यसपाल समिति अथवा प्रोफेसर यशपाल समिति कहा जाता है। यशपाल समिति के गठन का उद्देश्य तथा विद्यालयी बच्चों पर से शैक्षिक बोझ को कम करने के उपाय भारत सरकार को सुझाना ।

पाठ्यचर्या बोध का पूर्ण रूप से अध्ययन करने के पश्चात यशपाल समिति ने यह निष्कर्ष निकाला कि , विद्यालय बच्चों को पर बौद्ध की समस्या मात्र इसलिए उत्पन्न नहीं हो की विद्यालय की पाठ्यचर्या परिपूर्ण (design) त्रुटिपूर्ण है या अध्याय कम सक्षम है या विद्यालय प्रशासन कमजोर है या पाठ्यपुस्तक की उपयुक्त नहीं है ,अपितु बोझ की समस्या इसलिए भी है कि हम वास्तविक योग्यता और सक्षमता के विकास की तुलना में बच्चों की अहर्ताओं को अधिक महत्व देते हैं। इसलिए इसका संबंध ज्ञान विस्फोट ( knowledge explosive) तथा पकड़ लेना (catching up) संरक्षण से है।

हम आसान शब्दों में कह सकते हैं कि प्रोफेसर यशपाल समिति के द्वारा यह बताया गया कि हम बच्चों की वास्तविक विजेताओं की तुलना में डिग्रियों को अधिक महत्व देते हैं।

प्रोफेसर यशपाल समिति का यह विचार रहा कि पाठ्यचर्या निर्माण तथा पाठ्य पुस्तकों को तैयार करने का इस प्रकार विकेंद्रीकरण कर दिया जाए ताकि इस प्रक्रिया में अधिक अध्यापक,एजुकेटर तथा विशेषज्ञ अधिक स्वायत्ता के साथ सम्मिलित हो सके । वैज्ञानिकों और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों को पाठ्य पुस्तकों के निर्माण में परामर्शदाता के रूप में सम्मिलित किया जाना चाहिए ना की पुस्तक लेखक के रूप में।

प्रोफ़ेसर यशपाल समिति ने प्रतिस्पर्धा तथा व्यक्तिगत उपलब्धियों को पुरस्कृत करने को हतोत्साहित किया । क्योंकि इनके कारण बच्चे हर्षित या आनंद पूर्ण अधिगम से वंचित रह जाते हैं । इसके विपरीत प्रोफेसर यशपाल समिति ने सहयोग सामूहिक के लिए क्लब तथा सामूहिक उपलब्धियों को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की क्योंकि इनसे विद्यालयों में सहयोगात्मक अधिगम को बढ़ावा मिलता है। पूर्व बाल्यावस्था शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश के लिए कोई परीक्षा अथवा साक्षात्कार नहीं होना चाहिए।

इसके अतिरिक्त प्रोफेसर यशपाल समिति का सुझाव बच्चों को प्रतिदिन विद्यालय में बहुत सा भारी बस्ता लाने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए । पाठ्य पुस्तकों को विद्यालय की संपत्ति समझना चाहिए । अतः और यह भी जरूरी नहीं है कि प्रतिदिन पुस्तकों को घर पर ले जाए ।

प्रोफ़ेसर यशपाल समिति का विचार था कि प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों को गृह कार्य के बोझ के तले नहीं दबाना चाहिए सिवाय इसके कि वे घर के इर्द-गिर्द के वातावरण का अन्वेषण या पर्यवेक्षण करते रहे । उच्च प्राथमिक और माध्यमिक छांव में गृह कार्य जहां भी अनिवार्य होगा पाठ्यपुस्तक की होना चाहिए और यदि घर पर कार्य के लिए पाठ्य पुस्तकों की आवश्यकता हो तो चक्रीय आधार पर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

प्रो यशपाल समिति
प्रो यशपाल समिति http://Ctetpoint.com/what-is-ctetpoint/

प्रोफेसर यशपाल समिति द्वारा यह सुझाव दिया गया कि प्राथमिक कक्षाओं में सभी विषयों में पाठ्यचर्या तथा पाठ्यपुस्तक के अवधारणा आधारित होनी चाहिए। प्रोफेसर यशपाल समिति ने प्राथमिक कक्षाओं के सभी विषयों की पाठ्यपुस्तक के तथा पाठ्यक्रम के विषय में अपनी टिप्पणियां दी है।

इसके अनुसार भाषा संबंधी पाठ्य पुस्तकों में आम प्रयोग में आने वाले मुहावरे प्रतिबिंबित होने चाहिए और बच्चों की जीवन संबंधी अनुभूतियों काल्पनिक कहानियों तथा कविताओं और देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के जीवन को प्रतिबिंबित करने वाली कहानियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।. (Yashpal Committe 1992)

  • विज्ञान विषय को दैनिक जीवन पर आधारित होना चाहिए।
  • सामाजिक विज्ञान पाठ्यचर्या में इतिहास और भूगोल के ज्ञान के अतिरिक्त हमारे सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक प्रणालियों के प्रकारों का दर्शन व उनकी प्रविधि परिवर्तित होने चाहिए ताकि बच्चे सामाजिक आर्थिक विकास की समस्या और प्राथमिकताओं को विचलित कर सकें उन्हें समझ सके और उन पर चिंतन कर सकें।
  • कक्षा 6 से 8 तक के इतिहास के सिलेबस यानी पाठ्यक्रम में स्वतंत्र संग्राम तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हुए विकास पर बल दिया जाना चाहिए।
  • नागरिक शास्त्र को पाठ्यक्रम को समसमायिक अध्ययन से प्रतिस्थापित कर दिया जाना चाहिए और भूगोल के अध्ययन को समसमायिक यथार्थाता के साथ जोड़ दिया जाना चाहिए।

अधिगम की गुणवत्ता को सुधारने की दृष्टि से यशपाल समिति यह चाहती थी कि निजी विद्यालयों को मान्यता प्रदान करने संबंधी मानदंड कठोर होने चाहिए । समिति ने इस विचार की सराहना की कि गांव,खंड तथा जिला स्तर पर शिक्षा समिति बननी चाहिए जो अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले विद्यालयों की योजना और पर्यवेक्षण का दायित्व ले सके।

प्रोफेसर यशपाल समिति ( Yashpal Committe 1992 ) ने प्राथमिक शिक्षा के लिए निम्नलिखित गुणवत्ता मानदंडों का सुझाव दिया था ।

प्रो यशपाल समिति
प्रो यशपाल समिति
  • विद्यालय ग्रेडिंग में प्राप्त श्रेणी
  • समाज में प्रतिशतता
  • उपस्थिति प्रतिशतता

शिक्षा की गुणवत्ता मानक निम्नलिखित निष्कर्षों के आधार पर निर्धारित किए जा सकते हैं। अध्यापकों की तैयारी,अध्यापन विधि, शिक्षक सहायक सामग्री का उपयोग,बच्चों की क्रियाएं तथा प्रतिभागीता, कक्षा प्रबंधन,कला अन्य करे कल आप जो बच्चों को विभिन्न अनुभव हुआ अवसर प्रदान करते हैं और उन में सृजनात्मकता का क्षमता विकसित करते हैं।

यशपाल समिति ने एक कठोर अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम की सिफारिश की जिससे विद्यालय में संतोषजनक गुणवत्ता का अधिगम सुनिश्चित हो सके और अध्यापक प्रशिक्षणार्थियों में स्व अधिगम और स्वतंत्र चिंतन के योग्यता प्राप्त करने में सहायक हो सके ।

इस कार्यक्रम की अवधि स्नातक डिग्री के पश्चात 1 वर्ष और सीनियर हायर सेकेंडरी के पश्चात 3 वर्ष की करने की संस्तुति की इस कार्यक्रम की विषय वस्तु को पुनः संरक्षित किया जाए ताकि विद्यालय शिक्षा की बदलती हुई आवश्यकताओं के लिए इसका औचित्य सुनिश्चित हो सके और प्रैक्टिकम केंद्रित हो सके।

अध्यापकों के सतत शिक्षा लक्ष्य को प्राप्त करना तथा अध्यापकों के लिए उत्तम प्रशिक्षण तथा योग्यताओं की व्यवस्था करना इसमें सम्मिलित है।