शिक्षण के सिद्धांत (Theory of Teaching)

शिक्षण के सिद्धांत (Theory of Teaching) Shikshan Ke Sidhant, Teachin Method, Teaching Techniques.

शिक्षक जब छात्रों को ज्ञान देता है उसे शिक्षण कहते हैं l शिक्षण प्रक्रिया के दौरान एक शिक्षक को कुछ आधारों का अनुगमन करना होता हैं इन्हीं आधारों को या मान्यताओं को शिक्षण के सिद्धांत कहा जाता है l इस आर्टिकल में हम शिक्षण के शिद्धान्त (Theory of Teachings) के बारे में जानेंगे l जो की एक शिक्षक को अपनी शिक्षण प्रक्रिया में अवश्य शामिल किया है l

हम इस आर्टिकल में शिक्षण के सिद्धांत यानी प्रिंसिपल ऑफ टीचिंग का गहन अध्ययन करेंगे एक शिक्षक को अपने शिक्षण पद्धति को सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए कुछ सिद्धांतों का अनुसरण करना पड़ता है , इन्हीं को शिक्षण सिद्धांत कहा जाता है l

https://www.ctetpoint.com/शिक्षण-के-सिद्धांत-theory-of-teaching/‎
https://www.ctetpoint.com/शिक्षण-के-सिद्धांत-theory-of-teaching/‎

क्रियाशीलता का सिद्धांत :-

क्रियाशीलता का अर्थ होता है, क्रिया करते हुए सीखना l पूरी शिक्षण प्रक्रिया या अधिगम प्रक्रिया में छात्र तथा शिक्षक दोनों को ही क्रियाशील रहना अति आवश्यक है l अधिगम का कार्य बिना क्रियाशील हुए संभव ही नहीं है जिस कार्य में जितनी अधिक क्रियाशीलता रहती है वह कार्य उतना ही जल्दी सीखा जाता है l शिक्षण के सिद्धांत में इसका महत्वपूर्ण स्थान है l शिक्षण के सिद्धांत (Theory of Teaching)

छात्र को कक्षा में अधिक से अधिक क्रियाशील रहना चाहिए इससे छात्रों के मन मस्तिष्क तथा सभी अंग सक्रिय बने रहते हैं l बालक को ज्यादा से ज्यादा स्वयं करके सीखने का अवसर देना चाहिए l बालक जब स्वयं कार्य करता है तो उसे वह कभी नहीं भूलता वह उसका अधिगम स्थायी हो जाता है l Theory of Teaching या शिक्षण के सिद्धांत मे क्रियाशीलता का सिद्धांत का महत्वपूर्ण स्थान है l

फ्रोबेल महोदय :- ” बालक कार्य करके ही सीखता है और क्रिया द्वारा सीखना स्थायी सीखना कहलाता है l “

मांटेसरी, किंडरगार्टन तथा डाल्टन आदि क्रियाशीलता पर आधारित शिक्षण पद्धति है l जो क्रियाशीलता पर जोर देती है l महात्मा गांधी द्वारा चलाई गई बेसिक योजना तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 में करके सीखने पर महत्व दिया गया है l

प्रेरणा का सिद्धांत :-

शिक्षण में प्रेरक तत्व को शामिल करना ही प्रेरणा का सिद्धांत कहलाता है l शिक्षण के सिद्धांत (Theory of Teaching)
कैली महोदय का विचार था कि ” शिक्षण में अभिप्रेरणा किसी न किसी रूप में अवश्य उपस्थित रहती है ” l

प्रेरणा दो प्रकार की होती है :-

  • शाब्दिक प्रेरणा (शाबाश, अच्छा तथा अति उत्तम शब्दो के द्वारा प्रेरित करना)
  • अशाब्दिक प्रेरणा (दंड व पुरस्कार इत्यादि)

प्रेरणा अधिगम प्रक्रिया को प्रारंभ करती है l उसे जारी रखती और पूरा होने तक चलती रहती है l शिक्षक प्रेरक तत्वों द्वारा अधिगम प्रक्रिया रूचि पूर्ण तथा प्रभावी रूप बना सकता है l
एक बार बालक को प्रेरित करने के बाद सीखने की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है तथा शिक्षण प्रक्रिया सफल मानी जाती है l

रुचि का सिद्धांत :-

जिस कार्य में हमारा मन लगे उसमें हमारी रुचि होती है रुचि का सिद्धांत का भी यही अर्थ होता है l कि शिक्षण कार्य ऐसा होना चाहिए जिससे सीखने वाला पूरी रूचि ध्यान व तन्मय होकर सीखें l

कक्षा में रुचि पूर्ण शिक्षण की विधियां :-

  • जिज्ञासा :- बालकों की जिज्ञासा निरंतर बनाए रखना
  • सहसंबंधन :- एक पाठ का दूसरे पाठ से संबंध बनाते हुए पढ़ाना l इससे बालक का पूर्व ज्ञान नए ज्ञान से जुड़ जाएगा तथा अधिगम प्रक्रिया सफल होती है l
  • पाठ्य सहगामी सामग्री :-शिक्षण में पाठ्य सहगामी सामग्री का प्रयोग करना l

मैगडूगल :- ” रुचि प्रच्छन ध्यान है तथा ध्यान रुचि का क्रियाकलाप रूप है “l
शिक्षक पाठ को पढ़ाते समय चित्रों, मॉडलों तथा कहानियों का सहारा ले सकता है l इससे बालकों में रुचि बनी रहती है, वह सीखने की में अभी प्रेरित रहते हैं l
पाठ्य पुस्तक में एकाग्रता रुचि के सिद्धांत पर आधारित होती है l
अगर किसी बालक का पाठ में रुचि नहीं है तो अधिगम प्रक्रिया सफल मानी जाएगी l

निश्चित उद्देश्य का सिद्धांत :-

मनुष्य एक बुद्धिमान प्राणी है । वह जो भी कार्य करता है, उसका कोई ना कोई उद्देश्य अवश्य होता है । बिना उद्देश्य का कार्य सिद्ध नहीं हो सकता l ठीक इसी प्रकार शिक्षण भी एक उद्देश्य पूर्ण प्रक्रिया होती है l इसका पूर्व निश्चित उद्देश्य होता है । इसका लक्ष्य है अधिगमकर्ता के व्यवहार में उत्तरोत्तर सुधार करना l

पाठ को पढ़ाते समय शिक्षक पाठ का उद्देश्य ध्यान में रखकर अधिगम कराएं तो अधिगम प्रक्रिया प्रभावपूर्ण होती है l पाठ को पढ़ाने से पूर्व विषय वस्तु की योजना बनाना, प्रस्तुतीकरण करना तथा अधिगम सामग्री का निर्माण एवं प्रदर्शन करना चाहिए । इससे उस पाठ के निश्चित लक्ष्य पूर्ण होगा और संप्रेषण गुणवत्ता पूर्वक माना जाएगा l

नियोजन का सिद्धांत :-

शिक्षण करते समय प्रत्येक शिक्षक को अपने शिक्षण की योजना बनानी चाहिए उसके प्रस्तुतीकरण का क्रम ज्ञात होना चाहिए ताकि सीखने वाला भ्रमित ना हो सके l
एक सफल शिक्षक वही माना जाता है जो कक्षा में जाने से पूर्व भी योजना बना ले कि उसे क्या पढ़ाना है l
इस प्रकार की शिक्षण को नियोजित शिक्षक कहा जाता है

नियोजित शिक्षण का लाभ :-

  • समय श्रम की बचत होती है l
  • शिक्षण अधिगम क्रमबद्ध होता है l
  • शिक्षण का उद्देश्य पूरा होता है l
  • बालकों का सर्वांगीण विकास होता है l

चयन का सिद्धांत :-

शिक्षण प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया मानी जाती है l इसमें हमें विभिन्न विषयों को पढ़ाना व सीखना होता है l शिक्षक का यह दायित्व होता है कि कौन सा विषय पहले पढ़ाए ? कौन सा विषय बाद में?, किसी भी शिक्षण सामग्री को कैसे प्रस्तुत करें ? कौन सी कक्षागत समस्याओं को पहले हल करें ? ताकि शिक्षण अधिगम सफल हो सके l

अतः यह सभी समस्याओं का एक ही हल है ।वह है ,चयन के सिद्धांत । शिक्षक को चयन का सिद्धान्त का अनुसरण करना कि चाहिए।
एक सफल शिक्षक सरल तथा कठिन विषयों को उनके कठिनता के आधार पर उनका क्रम निर्धारित करता है l तथा छात्रों के सम्मुख प्रस्तुत करता है l
रयबर्न ” शिक्षक के अच्छे चयन की योग्यता पर उसके कार्य की सफलता निर्भर करती है “

व्यक्तिगत विभिन्नता का सिद्धांत :-

हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में एक दूसरे से भिन्न होता है l यहां तक एक ही मां-बाप के जुड़वा बालको में भी विभिनता के दर्शन होते हैं। इसलिए कक्षा-कक्ष में इस विविधता को ध्यान में रखकर शिक्षण प्रक्रिया की जानी चाहिए ।

लोकतांत्रिक व्यवहार का सिद्धांत :-

इस सिद्धांत का मूल तत्व है समानता और सहभागिता l
कक्षा में लोकतंत्र का होना अति आवश्यक है ।शिक्षक सभी बालकों को समान समझे तथा सभी को समान मौके दे l लोकतांत्रिक सिद्धांत कहता कि कक्षा – कक्ष लोकतंत्र की मूल भाव तथा सहभागिता पर आधारित होोता है।

जीवन से संबंध स्थापित करने का सिद्धांत :-

शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है ।शिक्षा के द्वारा ही जीवन को उन्नत बनाया जा सकता है l NCF-2005 में शिक्षा को जीवन से जोड़ने की बात कही गई है l

शिक्षक को शिक्षण कार्य करते समय पढ़ाई जाने वाली विषय वस्तु को बालक के जीवन से संबंध बनाने का प्रयास करना चाहिए l इस प्रक्रिया से वह ज्ञान बालक के लिए उपयोगी तथा सहज हो जाएगी l वह इस ज्ञान को आसानी से दैनिक जीवन में प्रयोग कर सकता तथा परिस्थिति से समायोजन कर l

पर्यावरण, भूगोल तथा सामाजिक विज्ञान का ज्ञान अर्जित किया इस ज्ञान का उपयोग आसपास के स्थान को स्वच्छ बनाने में किया जा सकता है ।
शिक्षण को केवल जीवन से ही नहीं अपितु एक विशेष को दूसरे विशेष से भी जोड़ना चाहिए l इसे विभिन्न विषय के बीच में संबंध स्थापित होगा और ज्ञान स्थाई होता l

आवृत्ति का सिद्धांत :-

आवृत्ति का अर्थ होता है बार-बार दोहराना l शिक्षण प्रक्रिया इस सिद्धांत का महत्व काफी है । जिस विषय को जितना दोहराया जाता है ।वह विषय उत्तरा ही मजबूत बनता है l कक्षा में आवृत्ति के सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए l गृह कार्य, मासिक परीक्षा छात्रों से पाठ को समझाने के लिए कहना l

निर्माण का मनोरंजन का सिद्धांत :-

जब तक शिक्षण कार्य में मनोरंजन प्रक्रिया शामिल नहीं होंगी l तब तक अधिगम सफल तथा सकारात्मक नहीं हो सकता l
शिक्षक को बालकों को पढ़ाने के साथ-साथ एक्टिविटी (शारीरिक व मानसिक) भी करवाना चाहिए । शिक्षण के सिद्धांत ( Theory of Teaching )

विभाजन का सिद्धांत :-

इस सिद्धांत को लाघु सोपानो का सिद्धांत भी कहा जाता है l शिक्षण स्वयं में व्यापक प्रक्रिया है। इसे सफल बनाने का सबसे आसान तरीका है, की इसे विभाजित करके पढ़ाया जाए l
शिक्षक कक्षा में पाठ्य वस्तु को विभाजित करके पढ़ाए l सरल से कठिन की ओर अग्रसर हो l

भाषा पढ़ाने के लिए सर्वप्रथम अक्षर फिर शब्द उसके बाद वाक्य सिखाया जाना चाहिए l
यह सिद्धांत वैज्ञानिक दृष्टि से पूर्ण है , क्योंकि विभाजन क्रम में आगे बढ़ते हुए शिक्षक के छात्रों के सीखने की गति स्तर का ज्ञान होता चला l

निष्कर्ष :-

सभी सिद्धांत एक दूसरे से पूर्ण रूप से जुड़े हुए हैं l इसका अनुपालन करने से शिक्षण बेहतर होता है l शिक्षा में गुणात्मक सुधार मिलता है l यह सिद्धांत शिक्षण प्रक्रिया को एक आधार प्रदान करती है l जिससे शिक्षण सहित सफल व प्रभावी हो सके l शिक्षण के सिद्धांत (Theory of Teaching) इस आर्टिकल के द्वारा आप सभी को शिक्षण के महत्वपूर्ण सिद्धन्तो के बारे मे विस्तार से बताया गया है l हमें आशा है कि आप सभी को यह आलेख पसंद आयगा

सोर्स :- GOVT. डाइट books, NCERT BOOKS ETC