शिक्षण के सूत्र ( Maxims of Teaching )

शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching. हम इस आर्टिकल में shikshan sutra ( Maxims of Teaching ) के बारे में पढ़ेंगे l

शिक्षण सूत्र ( Maxims of Teaching )

शिक्षण सूत्र शिक्षण प्रक्रिया में विशेष विधियों का ज्ञान कराते हैं। जिन्हें ध्यान में रखकर शिक्षण करके शिक्षक अपने छात्रों की उपलब्धि में गुणात्मक सुधार कर सकता है।
शिक्षा के कुछ निश्चित उद्देश्य होते हैं । इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए साधन के रूप में शिक्षण का प्रयोग किया जाता है । अच्छे शिक्षण की एक मुख्य विशेषता यह है, कि छात्रों को जो भी विषय वस्तु पढ़ाई या सिखाई जाती है वह उन्हें भली-भांति समझ में आनी चाहिए।

उन्हें सीखने के लिए प्रेरित करना तथा कक्षा में विषय शिक्षण में बालकों की रुचि व ध्यान प्राप्त करना अध्यापक की कुशलता पर निर्भर करता है । शिक्षक की कुशलता शिक्षण विधियों सिद्धांत और शिक्षण सूत्र और छात्रों की क्षमताओं के समुचित ज्ञान पर निर्भर करती है । इनकी जानकारी व समुचित प्रयोग द्वारा वह अपने शिक्षण तथा सीखने की क्रियाओं को प्रभावी बना सकता है l

मीनिंग ऑफ टीचिंग मैक्सिम्स ( शिक्षण सूत्र का अर्थ )

शिक्षण सूत्र maxims of teaching

कक्षा कक्ष में प्रत्येक विषय शिक्षक के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न होते हैं कि:-

1. मूल पाठ का प्रारंभ कैसे किया जाए?

2. शिक्षण कब और किस क्रम में किया जाए?

3. बच्चों का ध्यान कैसे आकर्षित किया जाए?

4. पाठ व विषय में उनकी रुचि कैसे उत्पन्न की जाए?

5. शिक्षण अधिगम सामग्री का प्रयोग कब, कैसे और कहां पर किया जाए?

शिक्षकों को उपरोक्त कठिनाइयों को समाधान करने के लिए मनोवैज्ञानिक और शिक्षा शास्त्रियों ने अपने अनुभव व विचारों को सूत्र रूप में प्रस्तुत किया है। जिन्हें शिक्षण के सूत्र कहा जाता है l यह सूत्र उस मार्ग की ओर संकेत करते हैं जिस पर चलकर शिक्षण अधिगम की प्रक्रिया सुगम रुचिकर प्रभावशाली व वैज्ञानिक बनाई जा सकती है।

यह सूत्र बाल प्रकृति पर आधारित है। यानी बाल मनोविज्ञान पर आधारित हैं ।अतः प्रत्येक अध्यापक को शिक्षण कला में सफलता व दक्षता प्राप्त करने के लिए अपने विषय ज्ञान के साथ-साथ इन शिक्षण सूत्रों का ज्ञान होना अति आवश्यक है । तथा एक शिक्षक को किस सूत्र का प्रयोग उसे किस स्थान पर और कैसे करना है । इसका भी ज्ञान होना अति आवश्यक है ताकि विषय वस्तु को सरलता से समझाया जा सके ।

कामोनियस एवं हर्बट स्पेंसर आदि ने अपने अनुभवों के आधार पर शिक्षण के कुछ समान्य नियम निर्धारित किये थे, जो बाद में शिक्षण सूत्र के नाम से जाने लगे ।

शिक्षण सूत्र की परिभाषा ( Definition of Maxims of Teaching )


. रेमंड के अनुसार शिक्षण सूत्र पथ प्रदर्शक करते हैं जिसमें सिद्धांत से व्यवहार में सहायता के लिए अपेक्षा की जाती है।
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार सूत्र एक आम सच्चाई है जो विज्ञान एवं अनुभव से ली जाती है । यह सूत्र अध्यापक को सुचारू रूप से शिक्षण में मदद करते हैं । विशेष रूप से प्रारंभिक कक्षाओं में पठन-पाठन की क्रिया आसान हो जाती है , क्योंकि यह सभी सूत्र छात्र को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

उपयुक्त परिभाषा पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है । कि शिक्षकों द्वारा अध्ययन अध्यापन को प्रभावशाली बनाने के लिए छात्रों को अध्ययन के प्रति जागरूक तथा क्रियाशील बनाने हेतु जो तकनीकी विधियां प्रयोग में लाई जाती है, वह शिक्षण सूत्र कहलाती है।

वैरीयस मैक्सिम्स आफ टीचिंग ( शिक्षण के विभिन्न सूत्र )

(1) सरल से जटिल की ओर

(2) ज्ञात से अज्ञात की ओर

(3) स्थूल से सूक्ष्म की ओर

(4) पूर्ण से अंश की ओर

(5) अनिश्चित से निश्चित की ओर

(6) प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर

(7) विशिष्ट से सामान्य की ओर

(8) विश्लेषण से संश्लेषण की ओर

(9) मनोवैज्ञानिक क्रम से तर्कसंगत की ओर

(10) अनुभव से युक्तियुक्त की ओर

(11) प्रकृति का अनुसरण

सरल से जटिल की ओर शिक्षण सूत्र ( FROM SIMPLE TO COMPLEX )

इस सूत्र का आशय यह है कि छात्रों को पहले सरल फिर जटिल बातों की जानकारी दी जानी चाहिए जिससे पाठ व विषय में उनकी रुचि व ध्यान बना रहे । यह क्रम बाल विकास के अनुकूल व मनोवैज्ञानिक होता है ।

क्योंकि बच्चा आयु बढ़ने व मानसिक विकास के साथ जटिल बातों को समझने लगता है । यदि अध्यापक प्रारंभ में कठिन बातों तथ्यों को छात्रों के सामने प्रस्तुत करेंगे तो बच्चा उनको समझने में असमर्थ होगा । इससे शिक्षण का प्रयास व्यर्थ हो जाएगा ।

हमारा कार्य और हमारा पाठ हमारे छात्रों के मानसिक स्तर के अनुकूल होना चाहिए। अर्थात सरल या कठिन बालकों की दृष्टि से होना चाहिए ना कि शिक्षक के अनुसार । हासिल के जोड़ व घटाना सिखाने से पहले बच्चों को गिनती व साधारण जोड़ घटाना सिखाना चाहिए।

ज्ञात से अज्ञात की ओर शिक्षण के सूत्र (From Known to Unknown Maxims of teaching )

इस सूत्र के अनुसार शिक्षक को बालकों के पूर्व ज्ञान को जांच कर उसी के आधार पर उन्हें नया ज्ञान देना चाहिए। मतलब शिक्षक द्वारा पहले वह बातें बतानी चाहिए जिन्हें वह जानता है । फिर उस विषय वस्तु पर आना चाहिए जिन्हें वह नहीं जानता क्योंकि हमेशा नवीन नवीन तथ्य बच्चों के लिए कठिन होते हैं। किसी पाठ में छात्रों की रुचि व ध्यान तभी संभव है जब उसमें जानकारी व नयापन दोनों सम्मिलित हो अतः शिक्षक को पढ़ाने से पूर्व छात्रों का पूर्व ज्ञान आवश्यक जांच लेना चाहिए।

जिस बात को हम जानते हैं वह हमारे लिए सरल और जिस बात को हम नहीं जानते वह हमारे लिए कठिन होती है। यह बात शिक्षक को सदैव ध्यान रखना चाहिए।
गणित में पहाड़ा सिखाने से पहले छात्रों को गिनती का ज्ञान होना अति आवश्यक है । तभी वह पहाड़ा आसानी से सीख सकेगा।

भाषा शिक्षण में वर्णमाला की जानकारी कराते समय प्रत्येक वर्ण से संबंधित वस्तु की जानकारी कराएं। उसके पश्चात उसी वर्ण से संबंधित एक से अधिक वस्तुओं की जानकारी कराई जा सकती है । जैसे क से कमल, कलम, कलश, कबूतर तथा ख से खरगोश, खत खड़ाऊ, खटमल इत्यादि l

स्थूल से सूक्ष्म की ओर (From Concrete to Abstract maxims of Teaching )

हरबर्ट स्पेंसर ने इस सूत्र को अपनाने पर विशेष बल दिया है उनके अनुसार हमारे पाठ का प्रारंभ स्थूल वस्तुओं से किया जाए और उसका अंत सूक्ष्म बातों से हो l
इस सूत्र को मूर्त से अमूर्त की ओर के नाम से भी जाना जाता है l
बच्चों के शारीरिक विकास के साथ-साथ उनका मानसिक विकास भी होता है शैशव अवस्था में वह सूक्ष्म अमूर्त वस्तुओं के बारे में नहीं जानता परंतु वह अमूर्त तथा स्थूल पदार्थों को सरलता से समझ लेता है ।

आयु बढ़ने के साथ-साथ उसमें सूक्ष्म भाव तथ्यों वस्तुओं को समझने की क्षमता का विकास होता जाता है। अतः शिक्षक को छोटे बच्चों को पढ़ाते समय प्रारंभ में केवल मूर्त वस्तुओं का ही प्रयोग करना चाहिए । और उसकी सहायता से सूक्ष्म बातों को बताना चाहिए।

उधारण गणित में जोड़ घटा सिखाने के लिए गेंद गोली कंकड़ आदि मूर्त वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए।

भूगोल में नदी पर्वत समुद्र ,झील ,तालाब, कुएं आदि का ज्ञान प्रत्यक्ष प्रदर्शन यानी भ्रमण फिर मॉडल अथवा चित्र चार्ट आदि के माध्यम से सरलता से कराया जा सकता है।

पूर्ण से अंश की ओर शिक्षण सूत्र ( From Whole to Part maxims of Teaching )

इस सूत्र का आधार गेस्टाल्टवाद यानी अवयवीवाद है l गेस्टाल्ट मनोविज्ञान के अनुसार हम किसी वस्तुओं को उसके पूर्ण रूप में ही देखते हैं। बालक के सामने कोई वस्तु आने पर हुआ सर्वप्रथम उसे पूर्ण रूप से देखता है , जानता है, वह समझता है । उसके विभिन्न अंगों वाह अंशो को नहीं ।

जैसे बालक सर्वप्रथम किस वृक्ष को उसके पूर्ण रूप में ही देखता है उसके भागों के बारे में अलग-अलग नहीं देखता।
शिक्षक को उसके इस पूर्व ज्ञान से लाभ उठाकर उसे वृक्ष के अंगों, जड़ ,तना डाली ,पत्ती, फूल आदि के बारे में जानकारी प्रदान करना चाहिए।

यह सूत्र काव्य शिक्षण में विशेष रूप से लागू होता है । जिससे पहले संपूर्ण कविता का पाठ करना उचित होता है। तत्पश्चात एक-एक पंक्ति का क्योंकि प्रारंभ में एक-एक पंक्ति पढ़ने से कविता के मूल भावना बच्चों को समझ में नहीं आती।

उदाहरण कंप्यूटर का ज्ञान कराने के लिए पहले कंप्यूटर व फिर उसके भागों जैसे मॉनिटर कीबोर्ड सीपीयू माउस प्रिंटर का ज्ञान कराया जाना चाहिए।
भूगोल में पहले भारत का मानचित्र दिखाकर फिर राज्यों का ज्ञान कराना चाहिए।

अनिश्चित से निश्चित की ओर शिक्षण सूत्र ( From Indefinite to Definite Maxims of Teaching )

बालकों के बौद्धिक विकास का क्रम अनिश्चित से निश्चित की ओर होता है। मानसिक विकास व अनुभव के साथ-साथ उसकी विचारों में स्पष्ट हुआ निश्चित आती हैl

प्रारंभ में बच्चों को किसी घटना तथ्य वस्तु का स्पष्ट व निश्चित ज्ञान नहीं होता। अनुभव परिपक्वता के अभाव व कल्पना की अधिकता के कारण हुआ उनके बारे में अपने मन में कुछ विचार बना लेते हैं । जो अस्पष्ट अनिश्चित व कई बार गलत भी होते हैं। अतः शिक्षक को चाहिए कि वह उनकी अनिश्चित ज्ञान को स्पष्ट व निश्चित करें और गलत धारणाओं व जानकारियों में सुधार करें ।

उदाहरण किसी देश व प्रदेश प्रमुख स्थल वहां की विशेषताओं से संबंधित छात्रों के स्पष्ट हुआ है । अनिश्चित ज्ञान को शिक्षक वहां के मानचित्र चित्र मॉडल चार्ट व उदाहरणों के माध्यम से निश्चित व स्पष्ट कर सकता है ।

प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष की ओर शिक्षण सूत्र ( From Seen to Unseen )

इस सूत्र के अनुसार छात्रों को सबसे पहले उनके द्वारा देखी गई वस्तुओं के बारे में बताना चाहिए । उसके बाद उन वस्तुओं के बारे में बताना चाहिए जिसे वह नहीं देख सकता है ।

उन्हें पहले उनकी वर्तमान की जानकारी कराई जानी चाहिए । वर्तमान के ज्ञान के आधार पर भूत व भविष्य की जानकारी प्रदान करनी चाहिए । क्योंकि जो वस्तुएं हमारे सामने होती हैं उनका ज्ञान हम आसानी से कर पाते हैं।

अतः शिक्षण के समय शिक्षक को छात्रों के प्रत्यक्ष वस्तुओं तथ्यों घटनाओं की जानकारी देने के लिए पहले प्रत्यक्ष वस्तुओं घटनाओं के उदाहरण प्रस्तुत करने चाहिए।

उदाहरण
भाषा में चित्र पठन व अन्य विषयों में सहायक सामग्री के माध्यम से बच्चों को अप्रत्यक्ष वस्तुओं के बारे में सरलता से जानकारी दी जा सकती है।
सामाजिक विषय में ग्लोब मॉडल चित्र आदि के माध्यम से संसार के विभिन्न भागो के बारे में बताया जा सकता है।

विशिष्ट से सामान्य की ओर शिक्षण सूत्र (From Particular to General )

इस सूत्र के अनुसार अध्यापक को छात्रों के सामने पहले किसी प्रकरण से संबंधित कई उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ,फिर उन्हीं की सहायता से सिद्धांत व नियम स्पष्ट करना चाहिए ।

शिक्षक द्वारा स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करके उन्हें निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करना चाहिए। ( शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching )
यह सूत्र बालकों को निरीक्षण परीक्षण विचार चिंतन आदि के अवसर प्रदान करता है । इसमें बच्चे रूचि पूर्ण सीखते हैं । जिससे प्राप्त ज्ञान स्थाई होता है ।विज्ञान, गणित तथा व्याकरण शिक्षण में यह सूत्र विशेष उपयोगी होता है।

इस सूत्र को दृष्टांत से सिद्धांत की ओर के नाम से भी जाना जाता है।
आगमन विधि में भी इस सूत्र का प्रयोग किया जाता है । अर्थात पहले उदाहरण प्रस्तुत करके निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है।

उदाहरण संज्ञा सर्वनाम क्रिया विशेषण पढ़ाते समय पहले इनकी एक से अधिक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए । उन्हीं उदाहरणों को समेकित करते हुए इनकी परिभाषा को स्पष्ट करना चाहिए।
संस्कृत ,हिंदी में सूक्ति एक विशिष्ट विचार से संबंधित होती है। परंतु उसकी व्याख्या सामान्य संदर्भ में की जाती। ( शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching )

विश्लेषण से संश्लेषण की ओर ( From Analysis to Synthesis )

एक शिक्षा शास्त्री के अनुसार किसी समस्या के ऐसे जीवित टुकड़े करना चाहिए, कि जिन के जोड़ने पर समस्या का हल तैयार हो जाए, विश्लेषण कहलाता है ।और खंडों में प्राप्त ज्ञान को जब जोड़कर समझाया जाता है तो उसे संश्लेषण कहा जाता है।

विश्लेषण, बालक को किसी बात को भली प्रकार समझने में सहायक होता है तो संश्लेषण उस बात के ज्ञान को निश्चित रूप से प्रदान करता है।

इस सूत्र के अनुसार किसी घटना यह तथ्य की जानकारी पहले समग्र रूप से करा कर ,.फिर उसके विभिन्न भागों को व्याख्या और विश्लेषण द्वारा स्पष्ट किया जाना चाहिए । उसके पश्चात उन भागों या खंडों को आपस में जोड़कर पूरी जानकारी कराकर निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए। ( शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching )

शिक्षण में विश्लेषण व संश्लेषण दोनों ही अति आवश्यक । यह शिक्षकों को इसका प्रयोग भरपूर मात्रा में अपने शिक्षण प्रक्रिया के दौरान करना चाहिए।

मनोवैज्ञानिक क्रम से तर्क संगत की ओर ( From Psychological to Logical )

छोटी कक्षाओं के लिए हमें मनोवैज्ञानिक क्रम का प्रयोग करना चाहिए । जैसे-जैसे बालक ऊंची कक्षाओं में पहुंचे तब हमें तर्कात्मक क्रम का प्रयोग करते रहना चाहिए एसके अग्रवाल के अनुसार ।

शिक्षा में बाल मनोविज्ञान के महत्व के कारण यह माना जाता है । कि बालक की शिक्षा उसकी रूचि और रुझानों क्षमता हुआ जिज्ञासाओं के अनुसार प्रदान करनी चाहिए । और जैसे-जैसे उसके ज्ञान का विकास होता जाए उसे विषय का तार्किक व क्रमबद्ध ज्ञान प्रदान करना चाहिए । इससे बालक की रूचि हुआ ध्यान पाठवा विषय में बना रहता है ।

बच्चों को इतिहास में मुगलकालीन स्थापत्य की जानकारी देना है ,तो मनोवैज्ञानिक विधि के अनुसार बच्चों को पहले स्थापत्य कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों के चित्र को दिखाकर चर्चा करनी चाहिए । जिससे वह पाठ में रूचि लेकर तार्किक ढंग से उनकी स्थापत्य संबंधी विशेषताओं को बताना चाहिए । (शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching )

अनुभव से युक्ति युक्त की ओर ( From Empirical to Rational )

अनुभूत ज्ञान वह होता है , जिसे बालक अपने निरीक्षण व अनुभव द्वारा प्राप्त करता है। उसके इस अपूर्ण व अन्य स्थित ज्ञान को वास्तविक व स्थाई बनाने के लिए उचित तर्क युक्त बनाना चाहिए । अल्पायु के कारण बालकों में तर्क व विचार के प्रयोग की क्षमता बड़ों के अपेक्षा कम होती है ।

उनकी जानकारियों का आधार उनका अपना अवलोकन व अनुभव होता है ।परंतु इन अनुभव के कारण खोजने में बाल मस्तिक असफल रहता है । अतः शिक्षा को बच्चों के अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान को शिक्षण प्रक्रिया में महत्व देना चाहिए तथा इन्हीं के आधार पर नया ज्ञान प्रदान करना चाहिए ।

प्रकृति का अनुसरण Follow to Nature.

इस सूत्र का आशय बालक की शिक्षा दीक्षा उसकी प्रकृति के अनुसार होनी चाहिए शिक्षक को उन्हें सिखाते समय उनकी आयु मानसिक स्तर क्षमताओं सूचियों को सदैव ध्यान में रखना चाहिए ।

पाठ्यक्रम पाठ्यवस्तु पाठ्यपुस्तक शिक्षण विधि शिक्षण अधिगम सामग्री व गतिविधि सभी कुछ बच्चों की शारीरिक व मानसिक विकास व आवश्यकता के अनुरूप होना चाहिए। यदि हमारी शिक्षा व शिक्षण बाल विकास में बाधक बनते हैं तो वह अनुचित आप प्रसांगिक वह मनोवैज्ञानिक होते हैं। अतः शिक्षक के रूप में हमें इस सूत्र का अनुसरण करके छात्रों के स्वभाविक विकास में सहायता करने को तत्पर रहना चाहिए । ( शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching )

शिक्षण के सूत्र की उपयोगिता है ( Utility of Maxims of teaching )


. शिक्षण के दौरान शिक्षा के उद्देश्य की प्राप्ति की जा सकती है । शिक्षा का महत्वपूर्ण और अंतिम लक्ष्य छात्रों के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना होता है। इस दृष्टि से शिक्षण का मुख्य उद्देश्य अधिगम होता है ,छात्रों में अधिगम प्रार्थी को सुनिश्चित करना।

शिक्षक का प्रमुख दायित्व होता है । अपने दायित्वों के कुशलता पूर्वक निर्वहन हेतु शिक्षक के लिए यह आवश्यक है कि वह शिक्षण की कला में दक्ष वन्य पूर्ण हो । ( शिक्षण के सूत्र ,Maxims of Teaching )

शिक्षण सूत्र इस कार्य में उसके लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं । इनके लिए प्रयोग द्वारा वह अपने शिक्षण को सरल ,रुचिकर तथा बाल उपयोगी बना सकता है । साथ ही साथ इनके प्रयोग द्वारा हुआ बच्चों के संप्राप्ति को अपेक्षित स्तर तक पहुंचा सकता है।

अध्यापन की सफलता हेतु प्रत्येक शिक्षक को इनकी जानकारी को प्रयोग में दक्षता अनिवार्य है। इससे कम समय में वस्त्रम में वह बच्चों को सीखने हेतु प्रेरित करके अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।