रक्त परिसंचरण तंत्र

रक्त परिसंचरण तंत्र  ( Blood Circulatory System) यह टॉपिक DSSSB, KVS, uptet, mptet, ctet, आदि में पूछा जाता है

मनुष्य के शरीर में हृदय, रुधिर तथा रुधिर वाहिनिया आदि मिलकर रक्त परिसंचरण तंत्र का निर्माण करते हैं
शरीर में रुधिर का परिसंचरण सदैव एक निश्चित दिशा में होता है और रुधिर परिसंचरण का कार्य हृदय द्वारा संपादित किया जाता है । रुधिर परिसंचरण की खोज विलियम हार्वे ने की थी ।बहुकोशिकीय जंतुओं के शरीर में विभिन्न पोषक पदार्थों,गैस,उत्सर्जित पदार्थ आदि के परिवहन के लिए एक तंत्र होता जिसे रुधिर परिसंचरण तंत्र कहा जाता है।

मनुष्य में रुधिर तथा लसीका द्वारा पचे हुए भोजन,ऑक्सीजन, हार्मोन, अपशिष्ट उत्पाद जैसे विविध पदार्थ संबंधित अंगों एवं उत्तकों तक पहुंचाए जाते हैं । रक्त परिसंचरण तंत्र ह्रदय, रुधिर तथा रुधिर वाहिकाओं से मिलकर बनता है।

1. हृदय (Heart):-

वक्ष के बाई और स्थित त्रिकोणी पेशीय रचना से युक्त हृदय एक  दोहरी भित्ति वाला झिल्लीनुमा थैली में बंद होता है ,जिसे हृदयावरण कहते हैं । हृदय पंप की भांति कार्य कर पूरे शरीर में रक्त का संचरण करता है। रक्त परिसंचरण तंत्र

  • 1 मिनट में है 5 से 6 लीटर शुद्ध रक्त शरीर को प्रवाहित करता है।
  • स्टेथेस्को से हृदय की ध्वनि मापी जाती है।
  • हृदय स्पंदन पेसमेकर द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
  • हृदय में गड़बड़ी का पता लगाने के लिए ।इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ECG). कराया जाता है ।
  • यह हृदय गति को एक रेखा चित्रपट अंकित करता है जिसे इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राफ कहते हैं।
  • एक स्वस्थ मनुष्य का सिस्टोलिक प्रेशर तथा  डायस्टोलिक प्रेशर120/80mmHg  होता है ।
  • रक्तचाप मापने वाले यंत्र का नाम स्फिग्मोमेनोमेटेर (Sphygmomanometer)  है।
  • जब अधिक मात्रा में ऑक्सीजन हृदय की मांसपेशियों में नहीं पहुंच पाता है तो छाती में तीव्र दर्द होने लगता है जिसे एन्जाइना (Angima) कहते हैं।
  • जीवाणु के संक्रमण से कपाट ठीक से कार्य नहीं करता है और हृदय की पेशियों कमजोर हो जाती उसे रूमेटिक हृदय रोग कहते हैं।
  • हृदय 4 कोष्ठकों में बटा होता है दाया आलिंद और दाया नीलय दिन में अशुद्ध रक्त होता है।
  • बाया आलिंद और बाँया नीलय दिन में शुद्ध रक्त होता है
  • हृदय के संकुचन (Systole) एवं शिथिलन (Diastole) को सम्मिलित रूप से हृदय की धड़कन कहते हैं।
  • सामान्य अवस्था में मनुष्य का हृदय 1 मिनट में 72 बार धड़कता है। जबकि भ्रूण अवस्था में 150 बार धड़कता है तथा धड़कन में लगभग 70 मिलीलीटर रक्त पंप करता है।
  • साइनो करिकुलर नोड (SAN) दाहिने अलिंद कि  दीवारों में स्थित तंत्रिका कोशिकाओं को समूह है जिसे हृदय धड़कन की तरंग प्रारंभ होती है।
  • थायरोक्सिन तथा एड्रीनलीन स्वतंत्र रूप से हृदय की धड़कन को नियंत्रण करने वाले हार्मोन है।
  • रुधिर में उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर के पीएच को कम करके हृदय की गति को बढ़ाता है।
  • अम्लीयता हृदय की गति को बढ़ाती है क्षारीयता हृदय की गति को कम करती है।
  • मनुष्य का हार्ट कार्डियक उत्तक से मिलकर बना होता है ।जो शंक्वाकार ( Conical) खोखली संरचना के रूप में वक्षीय गुहा में दोनों फेफड़ों के मध्य में स्थित होता है
  • मनुष्य का हृदय 12 सेंटीमीटर लंबाई 9 सेंटीमीटर चौड़ाई 6 सेंटीमीटर मोटा होता है तथा लगभग 300 ग्राम वजनी होता है।
  • रक्त का शुद्धिकरण फेफड़ों में होता है।
  • हृदय केवल रक्त को पंप करता है ना कि शुद्ध।
  • मनुष्य तथा स्तनधारियों का हृदय 4 कक्षा वाला होता है जिसमें दो आलिंद तथा दो नीलय  होते हैं।
  • हृदय की धड़कन पर नियंत्रण के लिए पोटेशियम आवश्यक है हृदय दो धड़कनों के बीच आराम करता है।
  • हृदय लगभग 5 लीटर रक्त प्रति मिनट पंप करता है।
  • नाड़ी की गति हृदय स्पंदन गति  (70 से 90) मिनट)  के समान होती है।
  • हृदय को रक्त का संभरण करने वाली धमनिया हृदय धमनिया (Coronary Arteries) कहलाती हैं, इनका कार्य शुद्ध रक्त को हृदय की दीवारों तक पहुंचाने का कार्य होता है।
  • रूमेटिक हृदय रोग का इलाज एस्पिरिन की मदद से किया जाता है।
  • हृदयाघात ( Heart Attack) के लक्षण :-
  • सीने में दर्द उठना
  • बाहों में दर्द और झनझनाहट
  • तेज पसीना आना हुआ जी मिचलाना आदि

(2) रुधिर वाहिकाएँ  (Blood Vessels) :-

रक्त, रुधिर वाहिकाओं में प्रवाहित होता है रुधिर वाहिका 3 प्रकार की होती है:-
1. धमनियां
2. शिराएं
3. कोशिकाएं

2.1 धमनिया (Arteries) :-  हृदय से शुद्ध रक्त को शरीर के विभिन्न भागों में ले जाने वाली कोशिकाओं को धमनिया कहते हैं।

  • सभी धमनियां ऑक्सीजनयुक्त रक्त का संचरण करती है।
  • धमनिया शरीर में काफी गहराई में स्थित होती है।
  • महाधमनी (Aorta) यह शरीर की सबसे बड़ी धमनी है जो बायनीलय से शुद्ध रक्त शरीर में पहुंच आती है ।
  • सिर्फ प्लमोनरी धमनी ऐसी है जो अशुद्ध रक्त को हृदय से फेफड़ों में शुद्धिकरण हेतु ले जाती है।
  • दाया आलिंद :- यह शरीर से अशुद्ध रक्त प्राप्त करता है।
  • बाया आलिंद :- बाएं आलिंद में फेफड़ों से शुद्ध रक्त आकर बाई निलय में जाता है l
  • धमनियों में रक्त का दबाव शिराओं से अधिक होता।

(2.2) शिराएँ ( Veins) :- सम्पूर्ण शरीर के विभिन्न अंगों से हृदय कि और अशुद्ध रक्त को लाने वाली  वाहिनियों को शिराएँ कहते हैं।
सिर्फ प्लमोनरी शिरा ऐसी है जिसके द्वारा शुद्ध रक्त का संचरण होता है।
यह फेफड़ों से ऑक्सीजन को हृदय के बाएं आलिंद ( Left Auricle) में पहुंचती  है।
महाशिरा ( Vena Cava) यह हृदय के दाहिने भाग को ऑक्सीजन की कमी वाले रक्त की आपूर्ति करता है । यह दो प्रकार का होता है।
1  अग्रमहाशिरा
2  पश्चमहाशिरा

पल्मोनरी शिरा :- यह शुद्ध रक्त फेफड़ो से बाय आलिंद में पहुंचाती है।
दाया निलय :-  अशुद्ध रक्त पलमोनरी धमनी में भेजता है।
बाया निलय :- यहां से शुद्ध रक्त शरीर के सभी उत्तकों में पहुंचाया जाता है।

(2.3) रुधिर कोशिकाएं (Blood Cupilliaries):-

  • यह बहुत ही महीन रुधिर वाहिनी या होती हैं।
  • इनकी भित्ति की मोटाई केवल एक कोशिका के स्तर की होती है।
  • यह धमनियों को शिराओं से जोड़ती है ।
  • शिराओं में रुधिर का फर्स्ट प्रभाव रोकने के लिए वॉलपेपर जाते हैं बाया आलिंद बाएं निलय में एक छिद्र द्वारा खुलता है जहां एक वाल्व पाया जाता है इसे Bicuspid Valve कहते हैं ।

(3) रक्त ( Blood)  :-

  • मानव शरीर में संचरण करने वाला तरल पदार्थ जो शिराओं के द्वारा हृदय में जमा होता है और धमनियों के द्वारा पुनः हृदय से संपूर्ण शरीर में परिसंचरण होता है रक्त कहलाता है।
  • रक्त स्वाद में नमकीन चिपचिपा अपारदर्शी जल से कुछ भारी जिसका घनत्व 1.04 से 1.07 के बीच होता है या क्षाारीय प्रकृति का तत्व होता जिस का पीएच मान 7.4 होता है।
  • रक्त की उत्पत्ति भ्रूण (Embryo) के मेसोडर्म  से हुई है जो कि एक प्रकार का संयोजी उत्तक होता है।
  • एक स्वस्थ व्यक्ति में रक्त की मात्रा 5 से 6 लीटर के बीच में होती है।
  • महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा आधा लीटर रक्त कम होता है।
  • रक्त की मात्रा शरीर के भार का लगभग 7% होती है
  • रक्त पूरे शरीर में हृदय तथा रक्त वाहिकाओं के माध्यम से घूमता है।
  • रुधिर एक तरल संयोजी उत्तक तथा प्राकृतिक कोलाइड है जो मुख्य रूप से दो तत्वों से मिलकर बना होता है।
  • प्लाज्मा (Plasma) तथा रुधिर  कोशिकाएं(Blood cells) ।

रुधिर कोशिकाएँ (Blood Cells) :- रक्त कोशिकाएं मुख्यतः तीन प्रकार की होती है:-

  • लाल रक्त कोशिकाएं
  • श्वेत रक्त कोशिकाएं
  • प्लेटलेट्स

1. लाल रक्त कणिकाएं यानी आरबीसी  :-

  • लाल रक्त कणिकाएं इनका आकार गोल, उभय उत्तल तथा तस्तरीनुमा होता है ।
  • आरबीसी प्लाज्मा झिल्ली द्वारा ढकी होती है ।
  • आरबीसी में केंद्रक नहीं पाया जाता है इसका रंग लाल हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन के कारण होता है।
  • इसका जीवनकाल 100 से 120 दिनों तक होता है आरबीसी का जन्म अस्थि मज्जा यानी बोन मैरो में होता तथा मृत्यु उसकी प्लीहा में होती है।
  • यह कोशिका एक गोलाकार होती है एवं इन में केंद्रक का अभाव पाया जाता है।
  • हिमोग्लोबिन नामक लाल वर्णन के कारण रुधिर का रंग लाल होता है।
  • लाल रक्त कणिकाएं ऑक्सीजन के परिवहन का कार्य करती है।
  • भ्रूण में आरबीसी का निर्माण की यकृत तथा प्लीहा में होता है।
  • रक्त को रुधिर बैंक में रखा जाता है रक्त को आधुनिक तकनीक व विधियों द्वारा 4.5 डिग्री सेल्सियस या 40 डिग्री फॉरेनहाइट पर कांच की प्लास्टिक की वायु रूध बोतलों में रखा जाता है।
  • रक्त को रुधिर बैंक में संरक्षित रखने के लिए इसमें सोडियम साइट्रेट मिलाया जाता है।
  • रुधिर देने वाले को दाता तथा रुधिर प्राप्त करने वाले को ग्राही कहते हैं।
  • विश्व का सबसे बड़ा रुधिर बैंक रेड क्रॉस सोसाइटी है।
  • एक घन मिलीमीटर में 5000000 रक्त कण पुरुषों में तथा 4500000 रक्त कण महिलाओं में होते हैं।
  • आरबीसी का सामान्य से कम होना है एनीमिया रोग कहलाता है।
  • लाल रुधिर कणिकाओं को एरिथ्रोसाइट के नाम से भी जाना जाता है जो केवल कशेरुकीय जंतुओं  ( Vertebrate  Animal ) में पाई जाती है।
  • मनुष्य में आरबीसी का निर्माण भ्रूणीय अवस्था में यह यकृत तथा प्लीहा या तिल्ली में होता है ,किंतु जन्म के उपरांत आरबीसी का निर्माण Bonemarrow यानी अस्थि मज्जा के द्वारा किया जाता है।
  • ऊंट एवं लामा दो ऐसे स्थनिय  है जिनके  आरबीसी में केंद्रक पाया जाता है।
  • आरबीसी का औसत जीवनकाल 120 दिन का होता है तत्पश्चात आरबीसी का यह यकृत  व प्लीहा के जल में फस कर मृत्यु हो जाती है ।
  • मृत आरबीसी को खाने के लिए शरीर में भक्षिय कोशिकाएं पाई जाती है जो इनका भक्षण करती है।
  • हिमोग्लोबिन को स्वसन रंगा ( Repiratory Pigment) भी कहा जाता है।
  • मानव शरीर मैं रक्त की अपर्याप्त आपूर्ति को इस्कीमिया कहते है ।
  • रक्त में हीमोग्लोबिन एक सम्मिश्रण प्रोटीन होता है जिसमें भरपूर मात्रा में लौह तत्व पाया जाता है।
  • यदि व्यक्ति को गलत प्रकार का रक्त दे दिया जाए तो थक्का बन जाता है तथा धमनियां संकुचित हो जाती है।
  • शरीर में रक्तचाप कम होता है तो एड्रिनल ग्रंथि से एड्रीनलीन हार्मोन निकलता जो रक्तचाप को बढ़ाता है।
  • हाइपरटेंशन के मरीजों में रक्तचाप सामान्य से कहीं ज्यादा पाया जाता है।
  • रक्तस्राव को रोकने के लिए आमतौर पर पोटाश एलम यानी फिटकरी का प्रयोग किया जाता है।
  • प्लीहा (Spleen) को शरीर का रक्त बैंक भी कहा जाता है।
  • सोते वक्त आरबीसी में 5% तक कमी आ जाती है तथा जब लोग 4200 मीटर की ऊंचाई पर होते हैं तो उनके आरबीसी में 30% तक की वृद्धि हो जाती है।
  • आरबीसी की संख्या हीमोसाइटोमीटर से मापी जाती है ।
  • आरबीसी तथा डब्ल्यूबीसी का अनुपात 600:1 अनुपात एक होता है।

2. WBC या श्वेत रक्त कणिकाएं :-

  • यह शरीर कि रक्षा करती है ।
  • श्वेत रक्त कणिकाओं को शरीर रक्षक कहा जाता है ।
  • डब्ल्यूबीसी का 60 से 70% भाग न्यूट्रॉफिल्स कणिकाओं का बना होता है न्यूट्रॉफिल्स कणिकाएं रोगाणुओं तथा जीवाणुओं का भक्षण करती है।
  • डब्ल्यूबीसी एक प्रकार की कोशिकाएं होती है जिसका आकार अनिश्चित होता है।
  • इसमें हीमोग्लोबिन का अभाव होता है ।
  • इसका मुख्य कार्य शरीर के रोगाणुओं से रक्षा के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना होता है।
  • WBC को लुकोसाइट भी कहा जाता है ।
  • इसमें केंद्रक का अभाव पाया जाता है।
  • डब्ल्यूबीसी का सामान्य से कम होना LEUCOPENIA कहलाता है।
  • श्वेत रक्त कणिकाओं को लुकोसाइट के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसका निर्माण अस्थि मज्जा में होता है।
  • इसका आकार अनिश्चित होता है यह शरीर की सबसे बड़ी रक्त कणिकाएं होती है जिसका आकार 8 से 22 माइक्रोन तक हो सकता है।
  • इसका औसत जीवनकाल 3 से 4 दिन का होता है
  • इसका मुख्य कार्य शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करना है ।
  • हिपेरिन रक्त को जमने से रोकता है इसलिए इसे रक्तप्रतिजामन (एंटीकोगुलेंट) भी कहा जाता है
  • हिस्टामिन एलर्जी से संबंधित है।
  • इयोसिनोफिल्स (Eosinphils) डब्ल्यूबीसी में 2-4% तक होती है।
  • उनकी संख्या बढ़ने पर इस्नोफीलिया रोग (Eosinophilia) हो जाता है।
  • लिंफोसाइट कोशिका शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करता है जो निम्न प्रकार से होता है।
  • B लिम्फोसाइट कोशिका उत्पादन तथा परिपक्वन अस्थिमज्जा में होता है और यह एंटीबॉडी का निर्माण करते हैं ।
  • T लिंफोसाइट्स इसका उत्पादन तो अस्थिमज्जा में होता है परंतु परिपक्वन थाइमस ग्रंथि में होता है यह एंटीजन को पहचानने का कार्य करते हैं।
  • लिंफोसाइट कणिकाविहीन श्वेतरुधिरणु होती है ।

(3) प्लेटलेट्स (PLATELETS):-

  • यह रक्त कोशिकाएं केंद्रक रहित एवं निश्चित आकार की होती है इसका मुख्य कार्य रक्त को जमने में मदद करना है। यह रुधिर स्कंदन रक्त वाहिकाओं की मरम्मत तथा संक्रमण से शरीर की रक्षा में सहायक होती है।
  • प्लेटलेट्स केवल स्तनधारी वर्ग के रक्त में पाई जाती है।
  • इसकी मात्रा प्रति घन मिलीमीटर में डेढ़ लाख से चार लाख तक होती है।
  • इसका आकार 0.02 मिली मीटर 0.004 मिली मीटर तक होता है तथा इसमें केंद्रक नहीं पाया जाता।
  • इसका निर्माण अस्थि मज्जा में होता है और मृत्यु प्लीहा में होती है।
  • इसका कार्य शरीर में कट जाने पर रक्त भाव को रोकना है
  • चिकनगुनिया तथा डेंगू में प्लेटलेट की मात्रा में तेजी से गिरावट आती है।

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