प्रदर्शन विधि (Demonstration Method)

प्रदर्शन विधि (Demonstration Method)

प्रदर्शन विधि ‘ देखो , सुनो और समझो ‘ किस सिद्धांत पर आधारित है। प्रदर्शन विधि को बहु ज्ञानेंद्रिय शिक्षण विधि कहा जाता है। आसान भाषा में हम कह सकते हैं कि छात्रों के सामने शिक्षक के द्वारा कुछ क्रिया करके दिखाने की विधि को प्रदर्शन विधि कहा जाता है।

इस विधि में शिक्षक कक्षा के सामने प्रयोग करता है या किसी उपकरण को संचालित करता है तथा छात्र रुचि के साथ प्रत्येक क्रिया को ध्यान से देखते हैं। शिक्षक कुछ बोलता है तथा छात्र उन्हें सुनते हैं।

प्रदर्शन विधि में बीच-बीच में छात्रों का सहयोग भी लिया जाता है । इस प्रकार ज्ञान प्राप्ति में प्रक्रिया में छात्रों को अधिक ज्ञानेंद्रिय क्रियाशील रहती है जिससे ज्ञान अधिक स्थाई रहता है । यह विधि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों में बहु उपयोगी मानी जाती है।

प्रदर्शन विधि
प्रदर्शन विधि , Demonstarion method

प्रदर्शन विधि के दोष (Demerit of Demonstration Method) :-

• प्रदर्शन विधि छात्रों के अनुकूल विधि नहीं मानी जाती है ।
• प्रदर्शन विधि शिक्षक केंद्रित विधि या अध्यापक केंद्रित विधि मानी जाती है।
• प्रदर्शन विधि में छात्रों को स्वयं कार्य करने का अवसर प्राप्त नहीं होता।
• छात्रों में प्रयोगशाला संबंधी कौशलों का विकास नहीं हो पाता है ।
• प्रदर्शन विधि कमजोर छात्रों के लिए उपयोगी नहीं मानी जाती है ।

प्रदर्शन विधि की विशेषताएं (Characteristics of Demonstration Method) :-

  • शिक्षक को छात्रों के सामने प्रदर्शन करने से पहले इसका अभ्यास कर लेना चाहिए।
  • प्रदर्शन पूर्व नियोजित होना चाहिए प्रदर्शन करते समय बरती जाने वाली सावधानियां अध्यापक को अपने मस्तिष्क में रखनी चाहिए।
  • प्रदर्शन किस उद्देश्य से किया जा रहा है यह भी अध्यापक को स्पष्ट होना चाहिए ।
  • प्रदर्शन प्रारंभ करने से पहले इसका उद्देश्य छात्रों को भी स्पष्ट कर देना चाहिए जिससे कि छात्रों के मन में कोई भ्रम ना रहे।
  • प्रदर्शन बहुत ही सरल व उचित गति के साथ होना चाहिए। प्रदर्शन करने में जल्दी बाजी करना किसी भी दशा में उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
  • अध्यापक छात्र को निर्देशित करता रहे कि शिक्षक द्वारा बताई गई बातों को अपनी नोटबुक में नोट करते रहें।
  • प्रदर्शन करते समय छात्रों का सहयोग लेने से हुए अधिक रुचि से ज्ञानार्जन करते हैं।
  • प्रदर्शन के साथ चार्ट , मॉडल व चित्रों का भी उपयोग इसे अधिक प्रभावशाली बना देता है।
  • प्रदर्शन में उपयोग किए जाने वाली शिक्षण सहायक सामग्री बड़े आकार के होने चाहिए
  • प्रदर्शन में प्रयोग होने वाले कुछ सामान अधिक मात्रा में भी रहना चाहिए ताकि एक चीज खराब हो जाने पर दूसरे सामान का उपयोग आसानी से किया जा सके।
  • प्रदूषण सभी छात्रों को ठीक से दिखाई पड़े यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • प्रदर्शन विधि द्वारा यदि जटिल यंत्र उपकरण प्रयोग करना हो तो उसके विभिन्न भागों का परिचय छात्रों को दे देना आवश्यक है।

प्रदर्शन विधि के गुण (Merit of Demonstration Method) :-

  • इस विधि से मनोशारीरिक विकास की पहल की जा सकती है।
  • प्रदर्शन विधि में सभी छात्रों को एक जैसा उपकरण प्रक्रिया और प्रविधि देखने को मिलता है जिससे उनका चिंतन तथा सोचने का ढंग भी एक ही दिशा में रहता है। यदि व्याख्यान द्वारा छात्रों को बताया जाए तो सभी छात्र इसके बारे में अलग-अलग कल्पनाएं करेंगे परंतु देख लेने से सभी का चिंतन समान दिशा में होता है।
  • इस विधि से छात्रों की रचनात्मकता वाद जिज्ञासा को संतुष्टि मिलती है।
  • प्रदर्शन विधि के द्वारा शुद्ध अनुभव प्राप्त किया जाता है।
  • प्रदर्शन विधि अधिक मनोवैज्ञानिक विधि मानी जाती है क्योंकि इस विधि में छात्र वस्तुओं को स्वयं देखते हैं तथा अपने ज्ञानेंद्रियों का प्रयोग करते हैं।
  • जब छात्रों को दिखाने वाली सामग्री काफी कीमती हो और उसे अधिक संख्या में ना खरीदा जा सके तो यह शिक्षण विधि अधिक उपयोगी मानी जाती है।
  • जब प्रयोग होने वाला सामान कोमल हो खतरनाक हो जटिल हो अर्थात बच्चों को देने वाला ना हो तब अध्यापक के कुशल हाथों द्वारा ही इसे प्रभावशाली रूप से प्रदर्शित किया जाना चाहिए।

प्रदर्शन विधि के दोष (Demerit of Demonstration Method):-

  • प्रदर्शन विधि छात्रों के अनुकूल विधि नहीं मानी जाती है ।
  • प्रदर्शन विधि शिक्षक केंद्रित विधि या अध्यापक केंद्रित विधि मानी जाती है।
  • प्रदर्शन विधि में छात्रों को स्वयं कार्य करने का अवसर प्राप्त नहीं होता।
  • छात्रों में प्रयोगशाला संबंधी कौशलों का विकास नहीं हो पाता है ।
  • प्रदर्शन विधि कमजोर छात्रों के लिए उपयोगी नहीं मानी जाती है ।