भारत में मनोविज्ञान का विकास

भारत में मनोविज्ञान का विकास | भारत में मनोविज्ञान का विकास कैसे हुआ ? | Developments of Psychology in india | भारत में पहली मनोविज्ञान प्रयोगशाला कहां खोली गई।

भारतीय दार्शनिक परंपरा इस बात में बनी रही है कि वह मानसिक प्रक्रियाओं तथा मानव चेतना, स्व, मन-शरीर के संबंध तथा अनेक मानसिक प्रकारों जैसे संज्ञान, प्रत्यक्षण, व्यवधान तथा तर्कना आदि पर उनकी झलक के संबंध में केंद्रित रही है।

भारत में आधुनिक मनोविज्ञान के विकास को भारतीय परंपरा की गहरी दार्शनिक जड़े भी प्रभावित नहीं कर सकी है। भारतीय मनोविज्ञान का आधुनिक काल कोलकाता विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में 1915 में प्रारंभ हुआ। जहां प्रायोगिक मनोविज्ञान का प्रथम पाठ्यक्रम आरंभ किया गया। तथा यहीं प्रथम मनोविज्ञान प्रयोगशाला स्थापित हुई।

कोलकाता विश्वविद्यालय में 1916 में प्रथम मनोविज्ञान विभाग तथा 1938 में अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान का विभाग प्रारंभ किया गया है। प्रोफेशर एन एन सेनगुप्ता जो वुंट की प्रायोगिक परंपरा में अमेरिका में प्रशिक्षण प्राप्त थे और उनसे बहुत प्रभावित थे। 1922 में प्रोफेसर गिरींद्र सेखर बोस मनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष बने जो कि फ्रायड के मनोविश्लेषण में प्रशिक्षण प्राप्त थे।

प्रोफेसर बोस ने साइकोएनालिटिक सोसाइटी की स्थापना 1922 ईस्वी में की थी। 1938 में कोलकाता विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग में एक अनुप्रयुक्त मनोविज्ञान (Applied Psychology) की शाखा भी खोली गई। इसके बाद मैसूर विश्वविद्यालय एवं पटना विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के अध्यापन एवं अनुसंधान के प्रारंभिक केंद्र प्रारंभ किए गए।

1960 के दशक के दौरान भारत में कई विश्वविद्यालय मनोविज्ञान का विश्वविद्यालय विभाग की स्थापना की गई। विश्वविद्यालय के प्रांगण से हटकर मनोविज्ञान विभिन्न तरह के संस्थानों जैसे प्रबंध संस्थान, शिक्षा संस्थान, रक्षा सेवा आदि में भी काफी लोकप्रिय हुआ। और भारतीय मनोविज्ञान की सक्रियता इसमें काफी अधिक रही। 1986 में दुर्गानंद सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘साइकोलॉजी इन थर्ड वर्ल्ड कंट्री द इंडियन एक्सपीरियंस’ में भारत में सामाजिक विज्ञान के रूप में चार चरणों में आधुनिक मनोविज्ञान के इतिहास को खोजा है।

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