औपचारिक शिक्षा (Formal Education)

औपचारिक शिक्षा (Formal Education) :-

औपचारिक, सविधिक, नियमित शिक्षा उसे कहते हैं जो कुछ निश्चित नियम के अनुसार क्रियाशील होती है और उसकी एक निश्चित योजना बनी होती है। स्कूल में शिक्षार्थीयों को यह शिक्षा निश्चित समय पर, निश्चित उद्देश्य से, विशेष विधियों के द्वारा ही दी जाती है। इसके लिए विशेष शिक्षा संस्थाएं होती हैं। जैसे कि प्राथमिक शिक्षा के लिए प्राथमिक विद्यालय , माध्यमिक शिक्षा के लिए माध्यमिक विद्यालय और उच्च शिक्षा के लिए उच्च स्तरीय विद्यालय अथवा विश्वविद्यालय।

इनमें विभिन्न कक्षाएं होती हैं और हर कक्षा का एक निश्चित पाठ्यक्रम होता है। इसी से पाठ्यवस्तु का निर्धारण किया जाता है। विद्यार्थी विद्यालय में आते हैं। अध्यापक उपयुक्त विधियों से शिक्षा प्रदान करते हैं। वर्ष के अंत में बालक की परीक्षा भी होती है जो जितना ज्ञान अर्जित करता है। उसी आधार पर उसको सफलता अथवा असफलता प्राप्त होती है। नियमित शिक्षा साधनों में विद्यालय , चर्च , पुस्तकालय , अजायबघर ,चित्र भवन तथा पुस्तके आदि प्रमुख हैं।

औपचारिक साधनों का अर्थ :-

शिक्षा के औपचारिक साधनों के अंतर्गत व संस्थाएं आती है।जिनके द्वारा किसी पूर्ण निश्चित योजना के अनुसार बालकों को नियंत्रित वातावरण में रखते हुए शिक्षा के संकुचित अथवा निश्चित उद्देश्य को प्राप्त किया जाता है। शिक्षा के औपचारिक साधनों का संपूर्ण वातावरण नियंत्रित होता है। इनके कार्य करने का स्थान तथा समय भी निश्चित होता है। इनकी देखभाल प्रशिक्षित व्यक्ति करते हैं।

औपचारिक साधनों के गुण :-

औपचारिक साधनों द्वारा संस्कृति का संरक्षण सुधार तथा हस्तांतरण होता है। इस प्रकार इन साधनों का सबसे बड़ा गुण यह है कि इनके द्वारा मानव समाज के उन अनुभवों तथा गुणों को निश्चित समय में प्राप्त किया जा सकता है जो अन्य साधनों के द्वारा असंभव है।

औपचारिक साधनों के दोष :-

जॉन डीवी ने औपचारिक शिक्षा के दोषों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि औपचारिक शिक्षा बड़ी सरलता से तुझ निर्जीव अस्पष्ट तथा किताबी बन जाती है। कम विकसित समाज में जो संचित ज्ञान होता है उसे कार्य में बदला जा सकता है पर उन्नत संस्कृति में जो बातें सीखी जाती हैं। वह प्रतीकों के रूप में होती है और उनको कार्य में परिणत नहीं किया जा सकता है।

इस बात का सदैव डर रहता है कि औपचारिक शिक्षा जीवन के अनुभव से कोई संबंध न रखकर केवल स्कूलों की विषय सामग्री ना बन जाए। इस प्रकार औपचारिक साधनों के दोष भी अनेक हैं। इस प्रकार की शिक्षा पाठ्यक्रम से जकड़ जाती है जिसके कारण बालक को समय चक्र तथा कठोर अनुशासन के बंधनों में जकड़ कर नियंत्रित वातावरण में रखा जाता है। ऐसे नियंत्रित वातावरण में बालक होता तो अवश्य बन जाता है परंतु ज्ञानी नहीं बन पाता हैं।

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