शिक्षा के स्वरूप (Forms of Teaching)

शिक्षा के स्वरूप (Forms of Teaching)

शिक्षा के स्वरूप निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं

  • नियमित व अनियमित शिक्षा
  • प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शिक्षा
  • व्यक्तिगत व सामूहिक शिक्षा
  • सामान्य व विशिष्ट शिक्षा

नियमित व अनियमित शिक्षा (Formal & Informal Education) :-


नियमित शिक्षा :- शिक्षा के जिस रूप में शिक्षा जानबूझकर और विचार पूर्वक दी जाती है उसे नियमित शिक्षा कहते हैं। इस शिक्षा को बालक भी जानबूझकर प्राप्त करते हैं। नियमित शिक्षा की योजना पहले से ही बना ली जाती है और इसका निश्चित उद्देश्य होता है। नियमित शिक्षा बालक को निश्चित समय पर नियमित रूप से निश्चित ज्ञान प्रदान किया जाता है। यह शिक्षा विशेष प्रकार की संस्थाओं में दी जाती है। इसका आरंभ अनियमित शिक्षा के बाद होता है। नियमित शिक्षा क की समय सीमा निश्चित होती है। एक समय के बाद नियमित शिक्षा का अंत हो जाता है। जब बालक वयस्क हो जाता है तब नियमित शिक्षक पूरी मानी जाती है। इस शिक्षा का प्रमुख स्थान स्कूल होते हैं। स्कूल के अतिरिक्त चर्च, पुस्तकालय, अजायबघर, चित्र भवन और पुस्तकें भी नियमित शिक्षा के साधन है।

अनियमित शिक्षा :- हिंदू संस्कृति के अनुसार यह शिक्षा बालक के जन्म से कुछ महीने पहले से ही प्रारंभ हो जाती है। इसलिए गर्भवती महिलाओं से आशा की जाती है कि वह अपना आचरण को अच्छा बनाए अभिमन्यु ने अपने माता के गर्भ नहीं चक्रव्यूह को तोड़ना सीख लिया था। अनियमित शिक्षा बालक को अनायास और आकस्मिक रूप से प्राप्त होती है। यह शिक्षा जीवन भर चलती रहती है। इसे बालक घर में घर के बाहर खेल के मैदान में अपने मित्रों के साथ बातचीत करने में उठते, बैठते, खेलते, कूदते हर समय किसी ना किसी रूप में प्राप्त करता है। वह अपने माता-पिता, भाई-बहनों मित्रों शिक्षकों आदि को कुछ करते हुए देखता है और उसका अनुकरण करता है। शिक्षा की कोई निश्चित योजना कोई निश्चित स्थान कोई निश्चित समय और कोई निश्चित नियम नहीं होता है। यह शिक्षा हर समय और हर स्थान पर किसी न किसी रूप में चलती रहती है। इस शिक्षा के साधनों में परिवार , धर्म , समाज , राज्य, रेडियो , समाचार पत्र , खेल का मैदान दल और समूह इत्यादि।

प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष शिक्षा (Direct or Indirect Education) :-


प्रत्यक्ष शिक्षा (Direct Education) :- इस शिक्षा को व्यक्तिक शिक्षा या पर्सनल एजुकेशन भी कहते हैं। यह शिक्षा अध्यापक और छात्र के बीच होती रहती है। अध्यापक अपने ज्ञान आदर्श और उद्देश्य से छात्र के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।

अप्रत्यक्ष शिक्षा (Indirect Education) :- इस प्रकार कि शिक्षा को अव्यक्तिक शिक्षा या इंपर्सनल एजुकेशन कहते हैं। जब छात्र पर अध्यापक के उपदेश का प्रभाव नहीं पड़ता है। तब वह विभिन्न प्रकार के अप्रत्यक्ष साधनों को अपनाकर छात्र के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विधियों के अंतर को उदाहरण द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं। मान लीजिए शिक्षक बालकों में समय तत्परता और नियम बद्ध आदतों का विकास करना चाहता है। वह इस कार्य को दो प्रकार से कर सकता है।

• वह समय तत्परता और नियमबद्धता पर उपदेश दे सकता है।
• वह अपने कार्यों में समयतत्पर और नियमबद्ध हो सकता है।
कुछ परिस्थितियों में प्रत्यक्ष विधि को भी अपनाया जा सकता है। उदाहरण के लिए बच्चों से कहना चाहिए कि यदि वह गर्मी के मौसम में धूप में खेलेगा तो बीमार हो सकता है। उससे यह भी कहा जा सकता है कि जाड़े के मौसम में पानी में भीगने से सर्दी लग सकती है फिर भी बालक को इन बातों का स्वयं अनुभव करने देना चाहिए क्योंकि तभी वह उपदेश के महत्व को समझ सकता है।

अतः शिक्षक का यह कर्तव्य है कि बच्चों में कार्य करने की आंतरिक इच्छा उत्पन्न करें और उन पर उसे करने के लिए किसी भी प्रकार का बल प्रयोग ना करें ऐसी दशा में ही मार्ग प्रदर्शन को सफल माना जाता है। यही वास्तव में सच्ची शिक्षा है। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा विवेकपूर्ण और ज्ञान पूर्ण पथ प्रदर्शन है।


व्यैक्तिक व सामूहिक शिक्षा (Individual & Collective Education) :-

व्यैक्तिक शिक्षा (Individual Education) :- व्यैक्तिक शिक्षा का संबंध केवल एक बालक से होता है। यह शिक्षक उसको व्यक्तिगत रूप से और अकेले दी जाती है। शिक्षा देते समय उसकी रुचि, प्रकृति, योग्यता और व्यक्तिगत विभिन्नता का पूरा पूरा ध्यान रखा जाता है। शिक्षा देते समय इन बातों के अनुकूल ही शिक्षण विधियों का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक समय में व्यैक्तिक शिक्षा पर बहुत बल दिया जा रहा है परिणाम स्वरूप अनेक व्यैक्तिक शिक्षण पद्धतियों की खोज की गई है।

सामूहिक शिक्षा (Collective Education) :- सामूहिक शिक्षा का संबंध एक बालक से ना होकर बालकों के समूह से होता है बहुत से बालकों के एक समूह को, एक कक्षा में एक साथ शिक्षा दी जाती है। इस शिक्षा में बालकों की व्यक्तिगत रूचि , प्रवृत्तियों, योग्यता की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है। आजकल सभी देशों के सभी प्रकार के स्कूलों में शिक्षा का यही स्वरूप प्रचलित है।

सामान्य व विशिष्ट शिक्षा (General & Specific Education) :-

सामान्य शिक्षा (General Education) :- इस शिक्षा को उधार शिक्षा भी कहते हैं आजकल के भारतीय हाई व हायर सेकंडरी स्कूलों में इसी प्रकार की शिक्षा प्रचलित है इस शिक्षा का कोई विशेष उद्देश्य नहीं होता है यह बालकों को केवल सामान्य जीवन के लिए तैयार करती है इसका उद्देश्य केवल उनकी सामान्य बुद्धि को तीव्र करना है यह उनको किसी विशेष व्यवसाय के लिए तैयार नहीं करती

विशिष्ट शिक्षा (Specific Education) :- यह शिक्षा किसी विशेष लक्ष्य को ध्यान में रखकर दी जाती है इसका उद्देश्य बालकों को किसी विशेष व्यवसाय या निश्चित कार्य के लिए तैयार करना होता है इस शिक्षा को प्राप्त करने के बाद बालक जीवन के एक विशेष या निश्चित क्षेत्र में कार्य करने के लिए कुशल समझा जाने लगता है बालक को इंजीनियर डॉक्टर वकील यह अकाउंटेंट बनाने हेतु दी जाने वाली शिक्षा विशिष्ट शिक्षा के उदाहरण है।

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