अनौपचारिक शिक्षा (Imformal Education)

अनौपचारिक शिक्षा


अनौपचारिक शिक्षा व्यवहारिक होती है। यह शिक्षा बिना किसी नियम अथवा बिना किसी विधि के प्राप्त होती है। बालक जन्म काल से ही इस शिक्षा को जीवन की विभिन्न परिस्थितियों से प्राप्त करता चलता है। यह शिक्षा अनुभवों से प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए बच्चा जन्म लेने के पश्चात माता के गोद का अनुभव , लोगों के साथ बातचीत करने के अनुभव और बड़ा होने पर खेल के मैदान का अनुभव तथा लोगों के साथ व्यवहार करने आदि परिस्थितियों से अनेक अनुभव प्राप्त करता रहता है। इसे इन्हें अनुभव से शिक्षा प्राप्त होती रहती है।

प्रत्येक बालक में कुछ क्षमता जन्मजात होती हैं जो उसके भौतिक और सामाजिक वातावरण के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती रहती है। यही क्षमता है बालक के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायता करती है। वर्तमान समय में बहुत सी संस्था चलाई जा रही है। जहां पर बालक को क्रिया करने का स्वतंत्र वातावरण प्रदान होता है और संस्थाएं उसके व्यवहार को परिमार्जित करके उसे आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है। अनौपचारिक शिक्षा के नियम भी लेते रहते हैं। इसमें शिक्षा का पाठ्यक्रम, संगठन तथा व्यवस्था का अभाव रहता है।

परिभाषा :-

“अनौपचारिक शिक्षा औपचारिकता से मुक्त एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था है जो औपचारिक शिक्षा की सीमा और कमियों की पूर्ति करती है। इस व्यवस्था में हुए औपचारिक तत्व नहीं है जो जन शिक्षा की दिशा में उनकी क्षमता को सीमित करते हैं। अतः यह औपचारिकता से मुक्ति की शिक्षा व्यवस्था है। यह एक सुनियोजित, लचीली शिक्षा व्यवस्था है जो समुदाय की आवश्यकता अनुसार नगर और ग्राम क्षेत्र के स्थानीय कार्य द्वारा जीवन उपयोगी व्यवस्था हेतु तैयार करती है। यह योजना कम समय में एक लचीले पाठ्यक्रम द्वारा निरक्षर को अपूर्ण रूप से शिक्षित करती हैं।

उद्देश्य :-

• अनौपचारिक शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वालंबन की भावना विकसित करना है
• भावी जीवन की उन्नति तथा समृद्धि हेतु तैयार करना है.
• शैक्षिकशैक्षिक स्तर के उन्नयन हेतु प्रयास करना है
• सभी को साक्षर करना है
• शिक्षा के सार्वजनिक करण का विस्तार करना है
• समूह में कार्य करने की भावना का विकास करना है

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