व्याख्यान विधि (Lecture Method)

व्याख्यान विधि (Lecture Method) :-

व्याख्यान विधि अंग्रेजी के ‘Lecture Method’ का हिंदी रूपांतरण है । Lecture का अर्थ किसी तथ्य , विषय को विस्तार से समझाना होता है। इस प्रकार व्याख्यान विधि में किसी तथ्य , विषय की व्याख्या की जाती है।

व्याख्यान विधि को शिक्षण की सबसे प्राचीन विधि माना जाता है। व्याख्यान विधि को आदर्शवादी विचारधारा की देन मानी जाती है । वर्तमान समय में अभी भी यह शिक्षण विधि प्रचलन में है।

व्याख्यान विधि को प्रभुत्ववादी शिक्षण विधि माना जाता है। इस विधि में शिक्षक की भूमिका प्रमुख होती है इसलिए इसे शिक्षक केंद्रित शिक्षण विधि मानी जाती है। यह विधि स्मृति स्तर (Memory Level) का शिक्षण अधिगम कराती है। सामाजिक विज्ञान में व्याख्यान विधि का प्रयोग सबसे अधिक होता है। व्याख्यान शिक्षण विधि में पाठ्य वस्तु एवं विषय वस्तु के प्रस्तुतीकरण पर अधिक बल दिया जाता है।

व्याख्यान विधि , Lecture Method
व्याख्यान विधि

व्याख्यान विधि (Lecture Method) में शिक्षक की क्रियाशीलता अधिक रहती है। छात्र इस शिक्षण विधि में मात्र श्रोता बनकर रह जाता है। छात्रों के ध्यान को विषय वस्तु की ओर केंद्रित करने के लिए अध्यापक कभी-कभी प्रश्न प्रविधि की भी सहायता लेता है। व्याख्यान विधि में शिक्षक को अधिक परिश्रम करना होता है क्योंकि कक्षा में जाने से पूर्व शिक्षक को व्याख्या की तैयारी करनी पड़ती है।

व्याख्यान विधि (Lecture Method) की विशेषताएं :-

  • व्याख्यान विधि मितव्ययी शिक्षण विधि मानी जाती है क्योंकि इसमें प्रयोग उपकरण व प्रदर्शन की आवश्यकता नहीं पड़ती है ।
  • अन्य विषयों के साथ आसानी से सह संबंध स्थापित किया जा सकता है।
  • इस शिक्षण विधि के द्वारा नवीन विषयों की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करने के लिए प्रेरणा मिलती है।
  • बालकों को मौलिक चिंतन की क्षमताओं के विकास का अवसर मिल पाता है।
  • इस शिक्षण विधि के द्वारा पाठ्यवस्तु के प्रस्तुतीकरण पर अधिक बल दिया जाता है।
  • व्याख्यान विधि समय की बचत करती है । थोड़े समय में अधिक विषय वस्तु का बोध सुगमता से कराया जाता है।
  • इससे बालकों को ध्यान केंद्रित करने की आदत पड़ती है।
  • शिक्षण विधि के द्वारा अध्यापक के व्यक्तित्व का विशेष प्रभाव रहता है । स्पष्टीकरण की सजगता से बालकों को अध्ययन के लिए प्रेरणा मिलती है।

व्याख्यान विधि (Lecture Method) की सीमाएं :-

  • बालक की अपेक्षा अध्यापक को अधिक महत्व दिया जाता है । इस विधि में शिक्षक का एकाधिकार रहता है।
  • इस विधि द्वारा छात्रों के पृष्ठपोषण यानी फीडबैक प्रभावशाली ढंग से नहीं दिया जा सकता तथा अध्यापक को भी यह पता नहीं चल पाता किस सीमा तक वह अपने व्याख्यान में सफल हुआ है।
  • इस विधि द्वारा शिक्षण बिंदु पर संतुलित बल नहीं दिया जाता अकसर अध्यापक व्याख्यान विधि में मुख्य विषय से हटकर बातें करने लगते हैं।
  • व्याख्यान विधि का प्रयोग उच्च कक्षाओं में ही किया जा सकता है प्राथमिक कक्षाओं के लिए इसका कोई महत्व नहीं है।
  • यह विधि उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उपयोगी नहीं होती । बालक भौतिक तथ्यों के संबंध में ज्ञान भले ही प्राप्त कर लेता परंतु वास्तविक ज्ञान अभिरुचि एवं अभिवृत्ति की दृष्टि से अन्य विधियों की सहायता लेनी पड़ती है।
  • इस विधि का उच्चतम प्रयोग केवल कुशल एवं योग्य अध्यापक ही कर सकते हैं।

व्याख्यान विधि हेतु सुझाव :-

  • व्याख्यान से कक्षा का वातावरण नीरज तथा गंभीर हो जाता इसलिए बीच-बीच में शिक्षक को हास्य , विनोद व मनोरंजक पूर्ण बातचीत करनी चाहिए।
  • इस विधि का प्रयोग माध्यमिक कक्षाओं से आरंभ करना चाहिए । कॉलेज तथा विश्वविद्यालय के स्तर पर उपयोग अधिक किया जाना चाहिए।
  • व्याख्यान के पश्चात छात्र पर व्यक्तिगत ध्यान देने हेतु ट्यूटोरियल कालांश लगाए जाने चाहिए।
  • व्याख्यान के समय सब्जेक्ट से हटकर फालतू बातें नहीं होनी चाहिए क्योंकि छात्र उसका संबंध भी पाठ्यवस्तु से कर लेते हैं।
  • शिक्षकों को बालकों के मानसिक स्तर एवं सूचियों का ध्यान रखना चाहिए।
  • व्याख्यान करते समय शिक्षक को बालक की मानसिक व सामाजिक विकास का ध्यान रखना चाहिए

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