मैसलो का मानवतावादी अधिगम सिद्धांत

मैसलो का मानवतावादी अधिगम सिद्धांत । मानवतावादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले मनोवैज्ञानिकों द्वारा मानवतावादी अधिगम सिद्धांत को जन्म मिला है। कार्ल रोजर्स, अब्राहम मस्लो, जोहन हाल्ट और macolm knowles आदि मानवतावादी विचारधारा में विश्वास रखते हैं इसलिए इन मनोवैज्ञानिकों को मानवतावादी मनोवैज्ञानिक ( Maslow’s Humanistic Theory of Learning) जाता है। मैस्लो का आवश्यकता का सिद्धांत , मैस्लों का सिद्धांत , maanvtavadi abhiprenna sidhant , Maslow’s theory of needs

अब्राहम मैसलो पहले मनोवैज्ञानिक के जिन्होंने मानवतावादी विचारधारा को तीसरी शक्ति (third power) के रूप में संबोधित किया तथा इसे मनोगत्यात्मक ( Psycho ndynamic) तथा व्यवहारवादी (Bihaviourist) से अलग करने का प्रयास किया था।

मानवतावादी विचारधारा ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम मनुष्य के साथ वस्तुओं या मशीनों की तरह व्यवहार करना बंद कर दें। उनके साथ मानवीय ढंग से पेश आएं तथा उनकी व्यक्तित्व और आत्मा का ध्यान रखें । Maslow’s ka manvtavadi siddhant

इसके परिणाम स्वरूप मनोविज्ञान में व्यक्तियों के अधिगम व्यवहार को जानने के लिए व्यवहारवादी एवं मनोगात्यात्मक विचारधाराओं के स्थान पर मानवतावादी विचारधारा को स्थान देने के प्रयत्नों को बढ़ावा मिला।

इस प्रकार मनोविज्ञान में व्यक्तियों के अधिगम व्यवहार को जानने के लिए अब मानवतावादी विचारधारा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। अब्राहम मैसलो द्वारा प्रतिपादित मानवतावादी अधिगम सिद्धांत का उद्गम स्रोत मनुष्य के द्वारा विकसित उसकी आवश्यकताओं को श्रृंखलाबद्ध, क्रमिक व्यवस्थापन अवधारणा में निहित है ।

वर्ष 1954 अब्राहम मैसलो ने अपनी इस अवधारणा को विकसित करते हुए यह स्पष्ट किया कि मानव मात्र की मूलभूत आवश्यकताओं को उनके महत्व उपयोगिता या अनिवार्यता की दृष्टि से निचले स्तर से लेकर उच्चतम स्तर के एक निश्चित क्रम में इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है कि एक आवश्यकता दूसरी आवश्यकता को जन्म देने का कारण बने।

मानव के व्यक्तित्व का विकास इस तरह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके निचले स्तर से उच्च स्तरों की इन सभी मूलभूत आवश्यकताओं की एक-एक करके अच्छी तरह पूर्ति होती रहे । मैसलो ने इन मूलभूत पांच प्रकार की आवश्यकताओं को निकले से लेकर उच्चतम पांच विभिन्न स्तर पर क्रमिक रूप से व्यवस्थित किया।

मैसलो का मानवतावादी अधिगम सिद्धांत
मैसलो का मानवतावादी अधिगम सिद्धांत

मैसलों ने मानव की मूलभूत आवश्यकताओं को पांच विभिन्न स्तर पर क्रमिक रूप से व्यवस्थित किया :-

  1. शारीरिक आवश्यकताएं (physiological needs) :- सबसे निचले स्तर पर शारीरिक आवश्यकताएं आती है इन आवश्यकताओ के उदाहरण के रूप में हम भूख ,प्यास, निद्रा ,विश्राम, योन तथा मल-मूत्र त्याग आदि आवश्यकताओं का नाम ले सकते हैं । मानव मात्र की सबसे पहले यह अवस्थाएं होती है जिनकी उसको अपने जीवित रहने स्वस्थ रहने तथा सृष्टि चक्र को बनाए रखने हेतु अधिक जरूरत होती है। जब तक इस स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो जाती व्यक्ति दूसरे स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति के बारे में नहीं सोच पाता।
  2. सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं (Safety need) :- दूसरे स्तर पर सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं आती है । व्यक्ति पहले स्तर की आवश्यकताओं को संतुष्टि के बाद अपनी शारीरिक मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के बारे में सोचने लगता है । समाज में व्यवस्था चाहता है । नियम एवं कानून के निर्माण तथा अनुपालन की बात सोचता है ताकि उसे ठीक प्रकार रहने हेतु एक सुरक्षात्मक वातावरण मिले उसकी ज्यादा से ज्यादा देखभाल एवं सुरक्षा हो सके । इस तरह की आवश्यकताओं की पूर्ति के पश्चात ही हो तीसरे स्तर की आवश्यकताओं की बारे में सोचता है।
  3. प्यार और दूसरे से संबंधित रहने की मूलभूत आवश्यकता (Love and Belongingness) :- यह मूलभूत आवश्यकताओं की तीसरा स्तर होता है। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी आयु , सामाजिक – सांस्कृतिक, स्तर , लिंग, धर्म तथा वर्ण का क्यों ना हो समान रूप से प्यार पाना और प्यार करना चाहता है। तथा उसमें किसी एक समूह वर्ग या श्रेणी से संबंधित रहने का , उसका अंग बन जाने , उसके द्वारा अपने को स्वीकार कर लेने तथा उसके प्रति अपनापन अनुभव करने की बेहद चाह पाई जाती है। इस प्रकार की मनोसामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति होना उसके अपने तथा समाज के हित के लिए बहुत ही आवश्यकहो जाती है । जब तक कि उसकी इस आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो जाती वह आगे के चौथे स्तर की आवश्यकता की पूर्ति के बारे में नहीं सोच पाता।
  4. आत्मसम्मान (selfness) :- चौथे स्तर पर आत्मसम्मान बनाए रखने से संबंधित आवश्यकता होती है इसकी पूर्ति हेतु व्यक्ति अपने आप में पर्याप्त रूप से सबल समर्थ एवं सक्षम बनना चाहता है । उपलब्धियां और प्रसिद्धि पाना चाहता है। अपने आप में आत्मविश्वास , आत्मनिर्भरता तथा आत्मबल का संचालन करना चाहता है ताकि वह अपने आप को अपनी तथा दूसरों की नजरों में प्रतिष्ठित तथा सम्माननीय बनाए रख सके। जब तक कि उसकी इस प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति नहीं होती वह आगे पांचवी स्तर पर अनुभव की जाने वाली असफलता के बारे में नहीं सोचता।
  5. आत्म अभिव्यक्ति (Self actualization) :- पांचवी स्तर पर आत्म अभिव्यक्ति संबंधी आवश्यकता आती है। इस प्रकार की उच्च स्तरीय आवश्यकता की पूर्ति में ही व्यक्ति का पूर्ण विकास नहीं रहता है। व्यक्ति जैसा अपने आप में होता है। जैसी भी प्रतिभा तथा योग्यता का उसमें निवास होता है उन सभी के प्रकाशन के लिए उस अवसर मिलना ही चाहिए इसी में उसकी अपनी व्यक्तित् का उचित विकास होता है । और उसकी अनूठे व्यक्तित्व को दूसरे पर अंकित होती है। इन सभी अफसरों की संतुष्टि के साथ-साथ व्यक्ति को अपने जीवन के लक्ष्य और उद्देश्य की प्राप्ति हो। (मैसलो का मानवतावादी अधिगम सिद्धांत)

मानवीय मूलभूत आवश्यकताओं को उनके निचले स्तर से उच्चतम स्तर तक क्रमिक रूप से नियोजित करने का प्रयास किया गया है।

मैसलो ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि हम किसी विशेष अवस्था तथा विशेष परिस्थिति में एक विशेष प्रकार का व्यवहार क्यों करते हैं। उसने बताया कि हमारा यह व्यवहार हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही होता है । जो एक तरह से हमारे व्यवहार संचालन के लिए संचालक का सफल भूमिका निभाता है।

मैसले के शब्दों में व्यक्ति विशेष को अपने किसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन लाने होते हैं । अर्थात कुछ ना कुछ नए अधिगम अनुभव से गुजरना होता है। और इस तरह आवश्यकताओं की पूर्ति ही अधिगम अर्जन का कारण बनती है। इसे अभी प्रेरित करती है तथा कौन किस रूप में अधिगम अर्जन करेगा ऐसा अधिगम पथ भी निश्चित करती है । इस प्रकार से मैसलो के अनुसार अधिगम को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके माध्यम से व्यक्ति विशेष द्वारा अपने व्यवहार में ऐसे परिवर्तन लाए जाते हैं जो उसके परिस्थिति विशेष में उसकी किसी एक या अन्य मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक सिद्ध हो सके।

मैसलो का अधिगम सिद्धांत अपने मानवतावादी दृष्टिकोण के अनुरूप ही अधिगमकर्ता को अपने सभी प्रकार के उद्देश्यों जिनसे उसकी सभी प्रकार की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति होती हो, की प्राप्ति में पूरी पूरी सहायता करने की बात करता है जीवन के अंतिम उद्देश्य या लक्ष्य की प्राप्ति की दृष्टि से ही इस बात पर बल देता है कि किसी भी अच्छी शिक्षा प्रणाली में बच्चों को आत्मा व्यक्ति के अवसर अवश्य ही प्रदान किए जाने चाहिए।

मैसलो के अधिगम सिद्धांत के शैक्षिक उपयोगिता (education implication of Maslow’s theory of learning) :-

मैसलो द्वारा प्रतिपादित अधिगम सिद्धांत के शैक्षिक उपयोगिता का संक्षेप में निम्न प्रकार से उल्लेख किया गया है :-

  1. विद्यार्थियों के साथ मानवता पूर्ण व्यवहार करना चाहिए न कि ऐसे मशीन एवम् पदार्थो की तरह कि उसके व्यवहार को तोड़ मरोड़ कर चाहे जैसा अधिगम पथ पर चलाए जा सके।
  2. सभी तरह से आत्म की प्रतिष्ठा पर बल दिया जाना चाहिए और इस दृष्टि से सभी बालकों को अपना आत्मसम्मान बनाए रखने , स्व की रक्षा करने और स्व अथवा आत्म प्रकाशन हेतु उचित अवसर दिए जाने के प्रयत्न किया जाना चाहिए।
  3. विद्यार्थियों का अधिगम व्यवहार उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु से ही संचालित होना चाहिए क्योंकि एक अधिगमकर्ता उसी अवस्था में अच्छी तरह सीखता है जब वह यह समझता है कि इस प्रकार के अधिगम से उसकी किसी न किसी विशेष आवश्यकता की पूर्ति हो रही है।
  4. मैसलो द्वारा प्रशंसा और निंदा दोनों को ही इस आधार पर निषेध किया गया क्योंकि यह दोनों ही विद्यार्थियों के उचित विकास में बाधक सिद्ध होते हैं। निंदा और सजा तो मनोवैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण ही है, परितोषिक और प्रशंसा आदि भी अपना नकारात्मक प्रभाव इसलिए छोड़ते हैं क्योंकि विद्यार्थियों को इन्हें प्रदान किए जाने पर उनकी इन्हीं की उपलब्धि में रुचि अधिक रहती है वास्तविक अधिगम में नहीं। विद्यार्थी उसी अवस्था में अधिगम कार्य करते हैं । जब उनकी प्रशंसा करने वाले अध्यापक उनके साथ रहे।
  5. विद्यार्थी अपने आप ही अनुशासन में रहें ऐसे प्रयत्न किए जाने चाहिए । क्योंकि स्व अनुशासन बाहर से तो गए अनुशासन से सदैव अच्छे परिणाम दिखाता है।
  6. एक अध्यापक को विद्यार्थियों के आत्मसम्मान का सदैव ध्यान रखना चाहिए । और विद्यार्थियों में आत्मसम्मान की भावना विकसित करने में मदद करना चाहिए।
  7. शिक्षक की प्रक्रिया को बाल केंद्रित नहीं बनाया जाना चाहिए।
  8. अध्यापक की भूमिका एक सूचना प्रदान करता की भी नहीं होनी चाहिए बल्कि वह सहायक और सुविधाएं प्रदान करने वाला होना चाहिए ।
  9. शिक्षकों विद्यार्थियों की आवश्यकता अनुसार अधिगम करने की समुचित अवसर प्राप्त कराना चाहिए।
  10. मानवतावादी अध्यापक को अपने विद्यार्थियों को कभी नीचा दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
  11. शिक्षण और अधिगम की प्रक्रिया भौतिक उद्देश्यों को आवश्यकता से अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। इसके स्थान पर प्यार और अपनापन आत्म सम्मान तथा आत्म प्रकाशन जैसे उचित आवश्यकता की पूर्ति मूल्यों के विकास को ही शिक्षा के परम उद्देश्य मानकर चलना चाहिए।