बाल विकास का अर्थ आवश्यकता तथा क्षेत्र

बाल विकास का अर्थ :-

विकास एक सार्वभौमिक प्रक्रिया होती है जो कि संसार के प्रत्येक जीव में पाई जाती है विकास की यह प्रक्रिया गर्भधारण से लेकर मृत्यु पर्यंत किसी न किसी रूप में चलती अवश्य रहती है हां इसकी गति कभी तीव्र और कभी मंद अवश्य होती है परंतु यह जीवन पर्यंत निरंतर चलती रहती है मानव विकास का अध्ययन मनोविज्ञान की जिस शाखा के अंतर्गत किया जाता है उसे बाल मनोविज्ञान कहा जाता है परंतु अब मनोविज्ञान की वह शाखा बाल विकास कही जाती है वर्तमान समय में बाल विकास के अध्ययनों में मनोवैज्ञानिकों की रुचि दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है इस क्योंकि इस दिशा में हुए अध्ययनों ने बालकों की जीवन को सुखी समृद्ध साली और प्रशंसनीय बनाने के महत्वपूर्ण योगदान दिया है

बाल विकास का अर्थ :-

बाल विकास मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में विकसित हुआ है इसके अंतर्गत बालकों के व्यवहार स्त्रियां समस्याओं तथा उन सभी कारणों का अध्ययन किया जाता है जिनका प्रभाव बालक के व्यवहार पर पड़ता है वर्तमान युग में अनेक सामाजिक सांस्कृतिक राजनीतिक एवं आर्थिक कारक मानव तथा उसके परिवेश को प्रभावित कर रहे हैं परिणाम स्वरूप बालक जो भाग्य समय की आधारशिला होता है वह भी इससे प्रभावित होता है

बाल विकास की परिभाषाएं निम्नलिखित हैं :-

क्रो और क्रो के अनुसार “बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो व्यक्ति के विकास का अध्ययन गर्व काल के प्रारंभ से किशोरावस्था की प्रारंभिक अवस्था तक करता है”

जेम्स ड्रेवर के अनुसार ” बाल मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्व अवस्था तक विकसित हो रहे मानव का अध्ययन किया जाता है”

थॉमसन के शब्दों में ” बाल मनोविज्ञान सभी को एक नई दिशा में संकेत करता है यदि उसे उचित रूप में समझा जा सके तथा उसका उचित समय पर उचित ढंग से विकास हो सके”

हरलॉक के अनुसार “आज बाल विकास में मुख्यतः बालक के रूप व्यवहार रूचि और लक्ष्य में होने वाले उन विशिष्ट परिवर्तनों की खोज पर बल दिया जाता है जो उसके एक विकासात्मक अवस्था से दूसरी विकासात्मक अवस्था में पदार्पण करते समय होते हैं बाल विकास में यह खोज करने का भी प्रयास किया जाता है कि यह परिवर्तन कब होते हैं इसके क्या कारण है और यह व्यक्ति की है या सार्वभौमिक है”

बाल विकास की आवश्यकता:-

बाल विकास अनुसंधान का एक क्षेत्र माना जाता है बालक के जीवन को सुखी और समृद्धशाली बनाने में बाल मनोविज्ञान का योगदान प्रशंसनीय है मनोविज्ञान की इस शाखा का केवल बालकों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबंध है जो बालकों की समस्याओं पर विचार करते हैं और बाल मनोविज्ञान की उपयोगिता को स्वीकार करते हैं

समाज के विभिन्न लोग बाल मनोविज्ञान से लाभ वंचित हो रहे हैं जैसे बालक के माता-पिता तथा अभिभावक बालक के शिक्षक बाल सुधारक तथा बाल चिकित्सक इत्यादि बाल मनोविज्ञान के द्वारा हम बाल मन और बाल व्यवहारों के रहस्य को भलीभांति समझ सकते हैं बाल मनोविज्ञान हमारे सम्मुख बालकों के भविष्य की एक उचित रूपरेखा प्रस्तुत करता है जिससे अध्यापक एवं अभिभावक बच्चे में अधिगम की क्षमता का सही विकास कर सकें किस अवस्था में बच्चे की कौन सी क्षमता का विकास कराना चाहिए इसका उचित प्रयोग आवश्यकता अनुसार विकास के प्रारूपों को जानने के पश्चात ही हो सकेगा उदाहरण के लिए एक बच्चे को चले ना तभी सिखाया जाए जब वह चलने की अवस्था का हो चुका है अन्यथा इसके परिणाम विपरीत आ सकते हैं

अतः बाल मनोविज्ञान की एक व्यवहारिक उपयोगिता यह भी है कि यह बालकों के समुचित निर्देशन के लिए व्यवहारिक उपाय बता सकते हैं हम निर्देशन के द्वारा बालकों की क्षमता और अभिवृत्ति ओ का उचित रूप से लाभ उठा सकते हैं व्यक्तिगत निर्देशन में बालक की व्यक्तिगत अभी व्यक्तियों का उचित रूप से लाभ उठा सकते हैं व्यक्तिगत निर्देशन में बालक की व्यक्तिगत कठिनाइयों और दोषों तथा उसकी प्रवृत्ति और उसके व्यक्तित्व से संबंधित विकारों को दूर करने के उपायों की जानकारी बाल मनोविज्ञान से प्राप्त होती है इसी प्रकार व्यवसायिक निर्देशन के अंतर्गत वह बालक को यह संकेत देता है कि वह व्यवसाय को चुनकर जीवन में अधिक से अधिक सफलता प्राप्त कर सकता है अंत में निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि वर्तमान समय में बाल मनोविज्ञान अत्यंत आवश्यक है बाल मनोविज्ञान की बिना मनोविज्ञान विषय अधूरापन लिए रहता है

बाल विकास का क्षेत्र :-

बाल विकास के चित्र में गर्भधारण अवस्था से युवा अवस्था तक के मानव की सभी व्यवहार संबंधी समस्या सम्मिलित होती हैं इस अवस्था के सभी मानव व्यवहार संबंधी समस्याओं के अध्ययन में विकासात्मक दृष्टिकोण मुख्य रूप से अपनाया जाता है इन अध्ययनों में मुख्य रूप से इस बात पर बल दिया जाता है कि विभिन्न विकास अवस्था में कौन-कौन से क्रमिक परिवर्तन होते हैं यह परिवर्तन किन कारणों से कब और क्यों होते हैं बाल विकास का क्षेत्र दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है बाल विकास विषय के क्षेत्र के अंतर्गत जिन समस्याओं अथवा विशेष सामग्री का अध्ययन किया जाता है वह निम्न प्रकार की हो सकती हैं

वातावरण और बालक :- बाल विकास में इस समस्या के अंतर्गत दो प्रकार की समस्याओं का अध्ययन किया जाता है प्रथम यह कि बालक का वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है दूसरा यह कि वातावरण बालक की व्यवहार व्यक्तित्व तथा शारीरिक विकास आदि को किस प्रकार प्रभावित करता है अतः स्पष्ट है कि बालक का पर्यावरण एक विशेष प्रभाव कार्यक्षेत्र होता है

मानसिक प्रक्रियाएं :- बाल विकास में बालक की विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन भी किया जाता है जैसे प्रत्यक्षीकरण सीखना कल्पना स्मृति चिंतन सहचार्य इत्यादि इन सभी मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन दो समस्याओं के रूप में किया जाता है प्रथम यह की विभिन्न आयु स्तरों पर बालक की यह विभिन्न मानसिक प्रक्रिया किस रूप में पाई जाती है इनकी क्या गलती है आदि-आदि दूसरा के यह किन मानसिक प्रक्रियाओ का विकास कैसे होता तथा इसके विकास को कौन से कारक प्रभावित करता है

बालकों की व्यक्तिगत विविधताओं का अध्ययन :- बाल विकास में व्यक्तिगत विविधताओं तथा इससे संबंधित समस्याओं का अध्ययन भी किया जाता है व्यक्तिगत वेदों की दृष्टि से निम्नलिखित तत्वों का अध्ययन किया जाता है जैसे शरीर रचना संबंधित भेद मानसिक योग्यता संबंधित भेद सामवेद व्यक्तित्व संबंधी भेद सामाजिक व्यवहार संबंधी भेद तथा भाषा विकास संबंधी भेद (बाल विकास का अर्थ आवश्यकता तथा क्षेत्र)

बाल व्यवहार और अंतर क्रियाएं :- बाल विकास के अध्ययन क्षेत्र में अनेक प्रकार की अंता क्रियाओं का अध्ययन भी होता है बालक का व्यवहार गतिशील होता है तथा उसकी विभिन्न शारीरिक और मानसिक योग्यता और विशेषताओं में क्रमिक विकास होता रहता है आतः स्वाभाविक है कि बालक और उसके वातावरण में समय-समय पर अंतः क्रिया होती रहे एक बालक के यह अंतरिया संयोग व्यवस्थापन सामाजिक संगठन या संघर्ष तनाव और विरोधी प्रकार की भी हो सकती है बाल मनोविज्ञान में इस समस्या का अध्ययन होता है कि विभिन्न विकास अवस्था में बालक की विभिन्न मंत्रियों में कौन-कौन से और क्या-क्या क्रमिक परिवर्तन होते हैं तथा इन परिवर्तनों की गतिशीलता किस प्रकार होती है

समायोजन संबंधित समस्याएं :– बाल विकास में बालक की विभिन्न प्रकार की समायोजन संबंधी समस्याओं का अध्ययन किया जाता है और साथ ही इस समस्या का अध्ययन भी किया जाता है कि भिन्न-भिन्न समायोजन क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न आयु स्तरों पर बालक का क्या और किस प्रकार समायोजन होता है इस क्षेत्र में कुछ समायोजित व्यवहार का भी अध्ययन किया जाता है

विशिष्ट बालको का अध्ययन :- जब बालक की शारीरिक और मानसिक योग्यता और विशेषताओं का विकास दोषपूर्ण ढंग से होता है तो बालक के व्यवहार और व्यक्तित्व में असमानता के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं बाल विकास में विभिन्न आज संबंधों व उनके कारणों और गतिशीलता का अध्ययन होता है विशिष्ट बालक की श्रेणी में निम्न बालक आते हैं शारीरिक रूप से अस्वस्थ रहने वाले बालक, पिछड़े बालक, अपराधी बालक एवं समस्यात्मक बालक इत्यादि ( बाल विकास का अर्थ आवश्यकता तथा क्षेत्र)

अभिभावक बालक संबंध :-बाल के व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में अभिभावकों और परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है अभिभावक बालक संबंध का विकास अभिभावक बालक संबंधों के निर्धारित परिवारिक संबंधों में गिरावट आदि समस्याओं का अध्ययन बाल विकास मनोविज्ञान क्षेत्र अंतर्गत किया जाता है

इस प्रकार हम कह सकते कि गर्भावस्था से लेकर किशोरावस्था तक की सभी समस्या बाल विकास किस परिसीमा क्षेत्र में आती है और एक बाल मनोवैज्ञानिक इन सभी समस्याओं का उचित ढंग से बालक के सर्व भौमिक विकास को करने के लिए इन समस्याओं का शीघ्र अति शीघ्र समाधान करना चाहेगा l बाल विकास का अर्थ आवश्यकता तथा क्षेत्र