शूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching)

सूक्ष्म शिक्षण Micro Teaching यह आर्टिकल CTET, DSSSB, KVS, UPTET के लिए महत्वपूर्ण है l

आप सभी ने कक्षा में अपने अध्यापकों को पढ़ाते हुए देखा होगा l उनमें से कुछ का शिक्षण कार्य बहुत अच्छा लगता होगा l उनके एक बार पढ़ाने पर अच्छी तरह समझ में आ जाता होगा l कभी आपने सोचा कि उनके पढ़ाने का तरीका इतना प्रभावशाली कैसे हैं? दरअसल उनके गुरुजनों ने शिक्षण कार्य में दक्षता प्रशिक्षण विधियों के बारंबार अभ्यास द्वारा पायी होगी l शिक्षण कार्य में समझ देने वाली नई विधियों में से एक भी दिए सूक्ष्म शिक्षण l

सूक्ष्म शिक्षण से तात्पर्य है शिक्षण का लघु रूप शिक्षण की जटिल प्रक्रियाओं को सरलतम ढंग से छोटे-छोटे सोपानों में प्रशिक्षुओ के सामने प्रस्तुत करने की एक रूचि पूर्ण प्रक्रिया ही वास्तव में सूक्ष्म शिक्षण कहलाती है l
सूक्ष्म शिक्षण में शिक्षण के अंतर्गत प्रशिक्षुओ को शिक्षण कौशल की बारीकियों से अवगत कराया जाता हैl अध्यापक बनने के पूर्व शिक्षण दक्षता का एक प्रकार से अभ्यास होता है l

सूक्ष्म शिक्षण
सूक्ष्म शिक्षण

परिभाषाएं :-

एलन ने अपनी पुस्तक माइक्रोटीचिंग में लिखा है ” सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) सभी प्रकार की शिक्षण संबंधी क्रियाओं को छोटे-छोटे भागों में विभक्त करना होता है ” ।

ए डब्ल्यू एलन को सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) का जन्मदाता माना जाता है l भारत में सेंट्रल पेडागोजीकल इंस्टीट्यूट के डॉ डी डी तिवारी ने इस विधि का सर्वप्रथम प्रयोग किया था ।

क्लिप्ट “, सूक्ष्म शिक्षण (Micro Teaching) :- अध्यापक प्रशिक्षण की वह विधि है, जिसमें शिक्षण की स्थितियों को सरल किया जाता है । और शिक्षण व्यवहार को किसी एक विशिष्ट कौशल के अभ्यास से जोड़ दिया जाता है । यह अभ्यास शिक्षण की अवधि कक्षा के आकार के छोटे स्वरूप पर होता है ,” ।

बी के पासी के अनुसार “:सूक्ष्म शिक्षण एक प्रशिक्षण तकनीकी है जो प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले शिक्षकों से यह अभिलाषा रखती है, कि किसी तत्व को थोड़े से छात्रों को, थोड़े समय में एक विशिष्ट शिक्षण कौशल के माध्यम से शिक्षण दें ” ।

सूक्ष्म शिक्षण सिखाने की छोटी प्रक्रिया है, जिसमें कक्षा के छोटे से आकार व समय में थोड़ी सी विषय वस्तु को अच्छे तरीके से सिखाया जाता है ।

सूक्ष्म शिक्षण से रिलेटेड महत्वपूर्ण बिंदु :-

  • Micro Teaching
  • सूक्ष्म शिक्षण में कक्षा का आकार छोटा होता है ।
  • पाठ्यवस्तु सीमित होती है ।
  • पढ़ाने की अवधी 10 मिनट होती है ।
  • छात्रों की संख्या 5 से 10 होती है ।
  • एक शिक्षण कौशल पर बल दिया जाता है ।

शूक्ष्म शिक्षण का उदाहरण :-

श्यामपट्ट कार्य को एक शिक्षण कौशल के रूप में सिखाना है, तो इसमें हम निम्नलिखित बिंदुओं को समझाएंगे ।

  • लेखन स्पष्ट व स्वच्छ होना चाहिए।
  • श्यामपट्ट के समक्ष किस दिशा में खड़े होकर लेखन शुरू हो इसका ध्यान होना चाहिए ।
  • लिखावट पठन योग्य होना चाहिए ।
  • लेख सीधी पंक्ति में होना चाहिए ।
  • लेखन करते समय चौक व श्यामपट की आवाज नहीं होनी चाहिए ।
  • कक्षा शिक्षण के बाद लिखित अंश को साफ कर देना चाहिए ।

सूक्ष्म शिक्षण एक प्रकार से अभ्यास की प्रक्रिया है, क्योंकि इसमें प्रशिक्षु थोड़े से छात्रों को 10 मिनट तक एक छोटा सा पाठ पढ़ाता है । पाठ खत्म होने के बाद प्रसिद्ध अपने पर्यवेक्षक से विचार-विमर्श करता है । थोड़े से अभ्यास के बाद छात्र अध्यापक अपने पाठ के संबंध में अपने पर्यवेक्षक के सुझाए गए आधारों पर पाठन करता है । मूल्यांकन करता है और अपने कक्षा शिक्षण को अच्छा बनाता है ।

सूक्ष्म शिक्षण की आवश्यकता एवं महत्व :

सूक्ष्म शिक्षण की प्रक्रिया द्वारा छात्र अध्यापकों को वास्तविक शिक्षण के लिए तैयार किया जाता है । परंपरागत शिक्षण को सरल बना कर प्रशिक्षकों को समझाया जाता है ।

इसकी आवश्यकता इस बात में निहित है कि यह सीमित समय में व संसाधनों में शिक्षण कार्य का अनुभव देता है । और एक-एक कौशल को क्रमशः सीखते हुए शिक्षण कला में दक्ष बनता है ।

इस शिक्षण द्वारा सबसे बड़ा लाभ यह है कि प्रशिक्षु पढ़ाने के बाद स्वयं शीघ्र ही पर्यवेक्षकों की सलाह पर अपने शिक्षण कार्य का मूल्यांकन करते हैं, और सुधार करते हैं l

सूक्ष्म शिक्षण की मूल बात यह है कि शिक्षण जैसे व्यापक संप्रत्यय को छोटे-छोटे भागों में समझाया जाए और धीरे-धीरे संपूर्णता की ओर बढ़ा जाए जिससे शिक्षण कार्य प्रभावी और उसमें गुणवत्ता आ जाए l

शूक्ष्म शिक्षण के चक्र (सोपान) :-

  • पाठ योजना
  • शिक्षण
  • प्रतिपुष्टि
  • पुनः नियोजन
  • पुनः शिक्षण
  • पुनः प्रतिपुष्टि
सूक्ष्म शिक्षण के चक्र
सूक्ष्म शिक्षण के चक्र

(1) नियोजन : – सबसे पहले कक्षा का निर्धारण होता है विषय वस्तु तथा कौशल का चयन किया जाता है l कक्षा में छात्रों की संख्या निश्चित की जाती है फिर पाठ योजना तैयार की जाती है l

(2) शिक्षण :- पाठ योजना के अनुसार निर्धारित कक्षा में शिक्षण कार्य किया जाता है। पर्यवेक्षक तथा साथी छात्र अध्यापक पढ़ाने वाले छात्र अध्यापक की आलोचना करते हैं। छात्राध्यापक स्वयं अपनी गलतियां देखता है। पर्यवेक्षक की सलाह अनुसार सुधार करता है। यह क्रिया तब तक चलती है जब तक वांछित सुधारना जाए l

(3) पश्च पोषण फीडबैक :- शिक्षण के बाद पर्यवेक्षक तथा साथ ही छात्र अध्यापकों से विचार-विमर्श होता है । गलतियों का विश्लेषण किया जाता है l Micro Teaching

(4) पुन: नियोजन :- पुनर शिक्षण के लिए नए छात्रों को ना लाकर पाठ्य सामग्री बदल कर शिक्षण कराया जाता है । उस नए विषय पर पाठ योजना बनाकर शिक्षण कार्य का अभ्यास किया जाता है l

(5) पुनः पश्चपोषण :- फीडबैक , पुनः शिक्षण के बाद पर्यवेक्षक किए गए शिक्षण पर अपनी टिप्पणी करता है । प्रशिक्षु के लिए प्रति पोषण का काम करती है l शिक्षण उत्तरोत्तर सुधरता जाता है इस प्रकार सूक्ष्म शिक्षण का चक्र अपने आप में शिक्षण की प्रक्रिया को समझाने में मदद करता है l

दरअसल Micro Teaching लघु से दीर्घ की ओर शिक्षण, छोटे से बड़े की तरफ या यूं कहें कि खंड से पूर्ण की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है l यह एक-एक कौशल पर गुणवत्ता का ध्यान रखकर शिक्षण कार्य में स्वामित्व प्रदान करती है l निरंतर अभ्यास की ओर प्रेरित करती है l

सूक्ष्म शिक्षण के मुख्य सिद्धांत:-

  • अभ्यास का सिद्धांत
  • निरंतरता का सिद्धांत
  • प्रबलन का सिद्धांत
  • मूल्यांकन का सिद्धांत

(1) अभ्यास का सिद्धांत :- सूक्ष्म शिक्षण में छोटी छोटी इकाई में अभ्यास कराया जाता है ताकि प्रशिक्षु कक्षा गत समस्याओं से अवगत हो सकें।

(2) निरंतरता का सिद्धांत :- यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक शिक्षण कौशल में परिपक्वता नहीं आ जाती ।

(3) प्रबलन तथा मूल्यांकन का सिद्धांत :- इस प्रक्रिया में छात्र अध्यापक पाठ नियोजन शिक्षण पर्यवेक्षक के निर्देशन में करते हैं l और कमियों में सुधार करते हैं l शिक्षण का व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करते हैं l तथा प्रति पोषण प्राप्त करते हैं l
इस शिक्षण विधि व प्रशिक्षुओं के लिए आत्म स्व मूल्यांकन का अवसर ज्यादा रहता है l अतएव अभिप्रेरणा मौजूद रहने से शिक्षण रूचि पुणे लगने लगता है l