समस्या समाधान विधि (Problem Solving Method)

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इस विधि के जनक प्राचीन काल के अनुसार सुकरात व सेंट थॉमस तथा आधुनिक समय के अनुसार जॉन डीवी है। समस्या समाधान विधि उस समय प्रकट होता है, जब उद्देश्य की प्राप्ति में किसी प्रकार की बाधा आती है। यदि लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग सीधा और आसान हो तो समस्या आती ही नहीं है। अतः समस्या एक कठिनाई है जो कि बालको द्वारा महसूस की जाती है। यह समस्या शारीरिक या मानसिक कठिनाई भी हो सकती है।

समस्या समाधान के अंतर्गत विभिन्न तरीकों से समस्या पर विचार करने हेतु वैज्ञानिक विधि का प्रयोग किया जाता है। समस्या समाधान से शिक्षण के अंतर्गत शैक्षिक दृष्टि से उपयोगी समस्याओं का ही चुनाव किया जाता है। तथा छात्र एवं अध्यापक मिलकर वैज्ञानिक तरीके से समस्या का समाधान करने का प्रयास करते हैं।

समस्या समाधान पद्धति के द्वारा शिक्षण करने का यह उद्देश्य होता है कि छात्रों में समस्या समाधान की योग्यताओं का विकास होता कि भावी जीवन में छात्र आने वाली समस्याओं से भयभीत होकर पलायन ना करें तथा समस्याओं का अवैज्ञानिक तरीके से समाधान ना निकाले, अपितु समस्याओं का नियोजित तरीके तथा वैज्ञानिक विधि से समाधान ढूंढे।

यह पद्धति इस मनोवैज्ञानिक मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक व्यक्ति के अंदर समस्याओं के अपने तरीके से समाधान की योग्यता तथा तर्क देने की क्षमता होती है। मात्र आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति के अंदर समस्या का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हल खोजने की क्षमता का विकास किया जाए।

अतः समस्या समाधान पद्धति की मुख्य विशेषता मानसिक क्रिया एवं चिंतन है। यह विधि चिंतन स्तर का शिक्षण और अधिगम कराती है।

समस्या समाधान पद्धति के पद (Steps of Problem Solving Method) :-

  1. समस्या का चयन करना (Selection of Problem Solving Method) :- समस्या का चुनाव करते समय अध्यापक को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि समस्या ऐसी हो जिसका समाधान करने की आवश्यकता शिक्षार्थी महसूस कर सकें। समस्या का चयन अध्यापक एवं शिक्षार्थी दोनों को मिलकर करना चाहिए। जहां तक हो सके विद्यार्थी द्वारा सुनाई गई विभिन्न समस्याओं में से ही किसी समस्या को अध्यापक को लेना चाहिए। समस्या के निर्धारण में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि समस्या बहुत अधिक व्यापक ना हो, समस्या में अस्पष्टता ना हो तथा उस पर प्रदत संकलन आसानी से किया जा सके।
  2. समस्या का प्रस्तुतीकरण (Presentation of Problems) :- समस्या का चुनाव करने के बाद अध्यापक को समस्या का पूरा विश्लेषण छात्रों के सम्मुख करना पड़ता है। यह विश्लेषण विचार विमर्श के द्वारा भी हो सकता है। तथा इस पद में अध्यापक शिक्षार्थियों को बताता है कि समस्या के समाधान की पद्धति क्या होगी?, प्रदत संकलन कहां से? और कैसे किया जाएगा? इस पद के ठीक प्रकार से पूर्ण होने से छात्रों को समस्या की पूरी जानकारी तथा समस्या समाधान के तरीके की जानकारी हो जाती है जिससे उन्हें आगे का कार्य करने की सुविधा रहती है।
  3. उपकल्पनाओं का निर्माण (Formulation of Hypothesis) :- समस्या के चयन के उपरांत समस्या की परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाता है कि समस्याओं के क्या संभावित कारण तथा क्या संभावित समाधान हो सकते हैं। उनकी सूची बनाई जाती है। समस्या समाधान पद्धति में उपकल्पनाओं के निर्माण से बालक में समस्या के कारणों पर गहन चिंतन करने की योग्यता विकसित होती है। उपकल्पना ऐसी बनानी चाहिए कि जिनका आसानी से परीक्षण किया जा सके।
  4. प्रदत संग्रह व उनका सत्यापन (Collection of Data &Verification) :- समस्या समाधान पद्धति के इस पद में तृतीय पद पर निर्मित उपकल्पनाओं का परीक्षण किया जाता है। पद 4 में किए गए आंकड़ों का विभिन्न सांख्यिकीय विधियों से विश्लेषण किया जाता है। तथा डाटा के विश्लेषण के द्वारा उनका अर्थापन किया जाता है। पदार्थों में छिपे संबंधों को ज्ञात किया जाता है जिसके लिए तथ्य को संगठित तथा व्यवस्थित करना होता है और फिर उनकी व्याख्या की जाती है।
  5. निष्कर्ष निकालना (Drawing Conclusions) :– आंकड़ों के विश्लेषण के उपरांत निष्कर्ष प्राप्त किया जाता है। जो की परिकल्पनाएँ आंकड़े विश्लेषण में सही पाई गई उनके आधार पर ही समस्या समाधान निष्कर्ष दिए जाते हैं। यदि आवश्यक हो तो इन निष्कर्षों को नवीन परिस्थितियों में लागू करके उनकी सत्यता की जांच भी की जा सकती है।

समस्या समाधान विधि के गुण / लाभ-

  • यह विधि छात्रों में अच्छी आदतों को विकसित करने में सहायक होती है।
  • इस विधि द्वारा सीखने से छात्र सोचने के लिए प्रेरित होते हैं।
  • समस्या समाधान विधि की प्रकृति मनोवैज्ञानिक है ।
  • छात्र को नवीन परिस्थितियों में कार्य करने का अवसर मिलता है।
  • यह विधि करके सीखने के सिद्धांत पर आधारित है।
  • छात्रों में विश्लेषण संश्लेषण एवं तर्क शक्ति का विकास होता है।
  • छात्रों में आत्मनिर्भरता एवं आत्मविश्वास का विकास होता है।
  • इस विधि में छात्र मिलकर एक साथ काम करते हैं जिससे उनमें सहयोग समूह मन एवं समूह भावना का विकास होता है।
  • छात्र में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है तथा वैज्ञानिक विधि का प्रशिक्षण प्राप्त होता है।
  • इस विधि द्वारा शिक्षण करने पर छात्रों का ज्ञान अधिक स्थाई होता है।
  • छात्रों मे सामान्यीकरण करने की योग्यता का विकास होता है।
  • अध्यापक तथा छात्रों के मध्य अधिक घनिष्ठ संबंध स्थापित होता है।

समस्या समाधान विधि की सीमाएं /हानियां :-

  • प्रत्येक विषय वस्तु और प्रकरण को इसके द्वारा नहीं पढ़ाया जा सकता है।
  • यह दीर्घ एवं महंगी विधि है।
  • इसके द्वारा शिक्षण करने पर समय अधिक लगता है।
  • यह मेरी छोटी कक्षाओं के छात्रों के लिए अधिक उपयुक्त है
  • प्रत्येक विषय वस्तु और प्रकरण को उसके द्वारा नहीं पढ़ा जा सकता।
  • सही समस्या का चयन करना स्वयं एक समस्या है।
  • इस विधि में शारीरिक गतिविधि के अपेक्षा मानसिक गतिविधियों पर अधिक बल दिया जाता है
  • इसके द्वारा शिक्षण करने पर श्रम एवं समय अधिक लगता है।
  • इस विधि में छात्रों से अधिक अपेक्षा की जाती हैं, जो कि मनोविज्ञान के अनुसार सही नहीं है।
  • समस्या समाधान विधि पर आधारित पुस्तकों एवं प्रशिक्षण प्राप्त अध्यापकों का अभाव है।
  • इस विधि द्वारा शिक्षण करने पर सीखने गति धीमी होती है।

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