किलपैट्रिक की परियोजना विधि (Project Method)

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प्रयोजना/परियोजना/ प्रोजेक्ट विधि (प्रोजेक्ट मेथड)

प्रयोजनवादी दार्शनिक विचारधारा के आधार पर महान शिक्षा शास्त्री विलियम किलपैट्रिक (William Kilpatrik) ने प्रयोजना या परियोजना पद्धति को जन्म दिया था। किलपैट्रिक महान दार्शनिक एवं शिक्षा शास्त्री जॉन डीवी (John Dewey) के शिष्य थे। यह विधि जॉन डीवी की विचारधारा एवं दर्शन पर आधारित है।

किलपैट्रिक ने सन 1918 में दी प्रोजेक्ट मेथड नामक शोध पत्र प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने अर्थ पूर्ण क्रिया करते समय छात्रों की रुचि एवं आवश्यकता, समस्या समाधान, अधिगम और व्यवहार पर विशेष बल दिया। प्रयोजना के अंतर्गत समस्या को व्यवहारिक एवं वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। जिससे छात्रों की कार्य में रुचि बनी रहती है तथा छात्र जल्दी भी सीखते हैं।

यह विधि चिंतन स्तर का शिक्षण अधिगम कराती है। प्रयोजना विधि से छात्र में सामाजिक कौशल उत्पन्न किए जाते हैं। प्रयोजना को परिभाषित करते हुए किलपैट्रिक ने लिखा है कि “प्रयोजना वह उद्देश्य का पूर्ण कार्य होता है जो पूर्ण क्षमता के साथ सामाजिक वातावरण में किया जाता है”,।
प्रोफेसर स्टीवेंसन ने कहा कि “प्रोजेक्ट एक समस्या मूल कार्य है जिसे स्वाभाविक परिस्थितियों में पूर्ण किया जाता है “, ।

योजना पद्धति के सिद्धांत (Principal of Project Method) :-

  • क्रियाशीलता का सिद्धांत (Principle of Activities)
  • वास्तविकता का सिद्धांत (Principle of Reality)
  • स्वतंत्रता का सिद्धांत (Principle of Freedom)
  • उपयोगिता का सिद्धांत (Principal of Purposiveness)
  • सामाजिक परिवेश का सिद्धांत (Purpose of Social Environment)
  • सोउद्देश्य का सिद्धांत (Principal of Utility)

यह विधि थोर्नडाइक के सीखने के निम्नलिखित तीन मुख्य नियमों पर आधारित है :-
• अभ्यास का नियम (Low of Exercise)
• प्रभाव का नियम (Low of Effect)
• तत्परता का नियम (Low of Readiness)

किलपैट्रिक महोदय के अनुसार प्रयोजनाएं चार प्रकार की होती हैं :-

रचनात्मक या उत्पादनात्मक परियोजना (creative, Constructive or Productive Project) :- कुआं खोदना, भवन निर्माण, मॉडल बनाना, नाव बनाना, पेड़ पौधे लगाना, मिट्टी की गोलियां बनाना इत्यादि यह सब इस रचनात्मक रचनात्मक किया उत्पादनात्मक परियोजनाएं हैं।

कलात्मक, सुंदरात्मक उपभोगात्मक परियोजना (Artistic, Aesthetic or Consumer Project) :– संगीत, नृत्य, गायन, कविताएं बनाना, सुनाना, कहानी कथन व चित्रों का प्रशंसात्मक रूप, पेंटिंग इत्यादि कलात्मक, सुंदरात्मक उपभोगात्मक परियोजना के उदाहरण है।
समस्यात्मक प्रयोजना (Problematics Projects) :- इस प्रकार की परियोजना में जनगणना, प्रदूषण, महंगाई व गरीबी की समस्या इत्यादि आती है।
अभ्यास की प्रयोजना (Drill Project) :- जैसे सुंदर हस्तलेखन, मानचित्र बनाना, चार्ट या ग्राफ बनाना, रेखाचित्र खींचना इत्यादि अभ्यास की प्रयोजना विधि के उदाहरण हैं

प्रयोजना विधि के 6 पद हैं। (Six Steps of Project Method) :-

  1. परिस्थिति उत्पन्न करना (Creating the Situation)
  2. योजना का चयन करना Selection the Project)
  3. प्रयोजना की तैयारी अथवा कार्यक्रम बनाना (Planning for the Project)
  4. प्रयोजना का क्रियान्वयन करना (Execution /Performing the Project)
  5. योजना का मूल्यांकन करना (Evaluation of the Project)
  6. प्रयोजना का आलेखन करना (Recording of the Project)

प्रयोजना विधि के लाभ (Merit/Advantages of Project Method) :-

  • यह एक बाल केंद्रित विधि है।
  • प्रयोजना विधि विभिन्न प्रकार के मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक नियमों एवं सिद्धांतों पर आधारित है।
  • इस विधि के द्वारा छात्रों में श्रम करने की आदत का विकास किया जाता है।
  • छात्रों को परस्पर अंत:क्रिया तथा विचारों के आदान-प्रदान करने का अवसर मिल जाता है।
  • छात्रों द्वारा स्वयं योजना बनाने तथा उसका क्रियान्वयन करने के कारण उनमें कार्य करने की तत्परता रहती है जो कि प्रभावी अधिगम के लिए अति आवश्यक है।
  • यह विधि उपयोगिता, क्रियाशीलता, वास्तविकता तथा कार्य करने की स्वतंत्रता के सिद्धांत पर आधारित है।
  • छात्रों में रचनात्मक तथा सृजनात्मक अथवा अपसारी चिंतन (Creative Thinking), योग्यताओं का विकास होता है।
  • इस विधि के द्वारा सीखने पर छात्रों में वैज्ञानिक तथा खोजपूर्ण दृष्टिकोण का विकास होता है।
  • इस विधि में छात्रों को करके सीखने (learning by doing) तथा अनुभव द्वारा सीखने का (Learning through Experience ) अवसर मिलता है।
  • इस विधि द्वारा अर्जित ज्ञान अधिक स्थाई तथा दीर्घकालीन हो जाता है।
  • यह कृषि एवं तकनीकी संस्थानों के लिए बहुत उपयोगी है।
  • यह एक व्यवहारिक तथा प्रयोगात्मक उपागम है।

प्रयोजना विधि के लाभ (Limitations /Demerit of Project Method) :-

  • इस विधि द्वारा शिक्षण करने पर समय तथा श्रम अधिक लगता है।
  • प्रत्येक प्रकरण या कांसेप्ट को इस विधि द्वारा पर आना संभव नहीं है।
  • यह एक अधिक महंगी व खर्चीली विधि है।
  • यदि सामूहिक परियोजना का संचालन भली-भांति ना किया जाए तो उसमें कुछ छात्रों का प्रभुत्व हो जाता है।
  • यह विधि उच्च कक्षाओं के लिए अधिक उपयोगी नहीं है।
  • इसके द्वारा शिक्षण करने पर विद्यालय के संपूर्ण समय सारणी प्रभावित हो जाती है।
  • इस विषय पर आधारित पाठ्य पुस्तकें तथा अन्य सामग्री का अभाव है।
  • इसके द्वारा शिक्षण करने पर संपूर्ण पाठ्यक्रम को समय पर पूरा करना संभव नहीं है।
  • इसके द्वारा अधिक क्रम में वध संगठित तथा नियमित अधिगम नहीं हो पाता।
  • इसमें अध्यापक से अधिक अपेक्षा की जाती तथा अतिरिक्त काम का बोझ भी बढ़ जाता है जो कि व्यवहारिक रूप से संभव नहीं हो पाता। किलपैट्रिक की परियोजना विधि

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