शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (Right to Education)

शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (Right to Education)

संविधान निर्माताओं ने संविधान बनाते समय अनुच्छेद 45 में वर्णित किया कि हम आने वाले 10 वर्षों के अंतर्गत यानी सन 1960 तक प्रारंभिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण कर देंगे। इसके लिए देश में लाखों विद्यालय खोलने की आवश्यकता है। लाखों विद्यालय खोले भी गई लेकिन अभी भी लाखों विद्यालय खोले जाने बाकी हैं सरकारी आंकड़ों के अनुसार 6 से 14 वर्ष के लगभग 95% बच्चे विद्यालय में नामांकित हो चुके हैं लेकिन स्थिति वास्तव में अभी भी भयानक है शेष बचे 5% बच्चों की संख्या भी लगभग 82 लाख है जो स्कूलों से अभी भी बाहर है

केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 एक अप्रैल 2010 से लागू किया है । इस अधिनियम का लक्ष्य है कि सन 2015 तक 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चे विद्यालयों में नामांकित हो जाने चाहिए जिससे कि प्रारंभिक शिक्षा का मूल अधिकार है ।86 वा संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के भाग 3 में एक नए अनुच्छेद 21(a) को समाविष्ट किया गया है । 1 अप्रैल 2010 से यह अधिनियम पूरे देश में लागू हो चुका है। जिससे 86 वां संविधान संशोधन अब अधिनियम प्रभावी बन गया है । एक नया अनुच्छेद 51A (k) मूल कर्तव्य बनाया गया है। इस प्रकार का अधिनियम बनाने वाला भारत विश्व का 135 वां देश बन गया है । शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में 7 अध्याय तथा 38 खंड है ।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम क्या है?

  • यदि कोई बच्चा 6 वर्ष तक की आयु तक प्रथम कक्षा में प्रवेश नहीं ले पाता है तो उसे बाद में उसकी आयु के अनुरूप कक्षा में प्रवेश दिया जाएगा और उसे उस कक्षा के स्तर तक लाने के लिए अतिरिक्त अध्ययन व प्रशिक्षण की सुविधाएं दी जाएंगी । ब्रिज कोर्स पाठ्यक्रम चलाकर विषयवार न्यूनतम अधिगम स्तर विकसित किया जाएगा।
  • किसी भी बच्चे को किसी भी कारण से विद्यालय से नहीं निकाला जाएगा
  • किसी भी बच्चे को प्रवेश देने से मना नहीं किया जाएगा
  • केंद्र सरकार राष्ट्रीय कल घरेलू उत्पाद का 1.8% हर वर्ष इस पर खर्च करेगी खर्च का 65% केंद्र सरकार तथा 35% खर्च राज्य सरकार को करना होगा
  • बिना मान्यता प्राप्त कोई स्कूल नहीं चल सकेगा
  • प्रतिवर्ष 220 दिन स्कूल जल लगना चाहिए
  • प्रति सप्ताह 45 घंटे स्कूल लगना अनिवार्य है।
  • किसी भी बच्चे को आठवीं कक्षा तक अनुकरण नहीं किया जाएगा आठवीं पास होने पर प्रमाण पत्र दिया जाएगा ।
  • छात्र अध्यापक अनुपात प्राथमिक स्तर पर 30:1 तथा माध्यमिक स्तर पर 35:1 रहेगा।

केंद्र सरकार राज्य व स्थानीय सरकार , विद्यालय व अभिभावकों के दायित्व :-

केंद्र सरकार का दायित्व :- केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा प्राधिकरण ( एजुकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया) राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का ढांचा तैयार करेगा तथा शिक्षकों को प्रशिक्षण के मानदंड भी तय किए जाएंगे। शिक्षा में नवाचार लाने के लिए अनुसंधान नियोजन आदि के लिए राज्य सरकारों को केंद्र सरकार तकनीकी सहायता प्रदान करेगी

राज्य सरकारी व स्थानीय सरकारों के दायित्व

6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे का प्रवेश विद्यालय में सुनिश्चित करना राज्य सरकार का दायित्व है । कोठारी कमीशन की सिफारिश के अनुसार प्रत्येक 1 किलोमीटर की सीमा में 1 प्राथमिक विद्यालय होना सुनिश्चित किया जाए।

विद्यालयों का दायित्व :-

सरकारी विद्यालय तो निशुल्क शिक्षा देंगे ही परंतु पब्लिक विद्यालय में भी 25% सीटों पर निर्धन अभिभावकों के बच्चों का प्रवेश का हक होगा यदि यह स्कूल अभिभावकों से कोई चंदा याददान लेंगे तो पहली बार इन पर ₹25000 इसके बाद हर बार ₹50000 का आर्थिक दंड सरकार लगा सकेगी गैर सहायता प्राप्त पर लागू नहीं होगा ।

अभिभावकों का मूल कर्तव्य:-

प्रत्येक अभिभावकों का यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अपने 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को विद्यालय में भेजना अनिवार्य है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51a(k) भी इसी बात का अनुसरण करता है।

विद्यालयों के कामकाज की निगरानी :-

विद्यालय में कामकाज की निगरानी के लिए प्रत्येक विद्यालय में 16 सालों से एक कार्यशाला संबंध समिति बनाई जाएगी। इस समिति में स्थानीय सरकार काफिला हुआ प्रतिनिधि 2 शिक्षक प्रधानाचार्य वह 12 अभिभावक शामिल होंगे अभिभावकों में निर्धन अभिभावकों को भी समानुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाएगा

शिक्षण के स्तर को सुधारने के उपाय :-

  • राष्ट्रीय शिक्षा प्राधिकरण शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता का निर्धारण करेगा
  • पहले से सेवारत शिक्षक यदि अप्रशिक्षित होगा तो उसे 5 साल के अंदर अंदर शिक्षक प्रशिक्षण लेना होगा
  • शिक्षकों को नियमित रूप से विद्यालय आना होगा पूरा पाठ्यक्रम पढ़ाना होगा।
  • छात्रों का मूल्यांकन करना होगा और अभिभावकों से निरंतर संपर्क रखना होगा
  • शिक्षकों की रिक्तियां 10% से ज्यादा नहीं रहेगी

छात्रों का सर्वांगीण विकास :-

छात्रों का शैक्षिक एवं सह शैक्षिक विकास होना अति आवश्यक है। इसलिए उन्हें गतिविधियों के माध्यम से अधिगम कराया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद का गठन एवं कार्य:-

राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद का गठन केंद्र सरकार करेगी इस परिषद में प्रारंभिक शिक्षा तथा बाल विकास के क्षेत्र में व्यवहारिक ज्ञान व अनुभव रखने वाले विशेषज्ञों को रखा जाएगा इस परिषद का कार्य इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए केंद्र सरकार को परामर्श देना होगा।

विद्यालय से संबंधित शिकायतों का निवारण:-

राष्ट्रीय राज्य बाल अधिकार आयोग शिकायतों की जांच करेगा संबंधित स्थानीय निकायों को भी शिकायतों पर सुनवाई करने का अधिकार होगा।

पाठ्यक्रम का निर्माण एवं मूल्यांकन पद्धति का निर्धारण-

केंद्र सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय शिक्षा प्राधिकरण राष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यक्रम का निर्माण करेगा सतत एवं व्यापक मूल्यांकन पद्धति अपनाई जाएगी।