सहभागी शिक्षण

सहभागी शिक्षण

सहभागी शिक्षण क्या है? सहभागी शिक्षण की आवश्यकता, सहभागी शिक्षण का अर्थ, सहभागी शिक्षण इन हिंदी

प्राचीन काल से ही शिक्षा में शिक्षण प्रक्रिया का संबंध दो पक्षों से रहा है। इसमें प्रथम पक्ष शिक्षा प्रदान करने वाला होता है जिसे गुरु के नाम से जानते हैं। वर्तमान में उसको शिक्षक के नाम से जाना जाता है। दूसरा पक्ष शिक्षा ग्रहण करने वाला होता है। जिसे प्राचीन काल में शिष्य तथा वर्तमान समय में छात्र के नाम से जाना जाता है। इन दोनों पक्षों के मध्य ही शिक्षण व्यवस्था के ताने-बाने को बुना जाता था। दोनों ही शिक्षण प्रक्रिया के लिए अनिवार्य माने जाते थे। शिक्षण प्रक्रिया को प्रभावशाली बनाने के लिए प्राचीन काल में शिक्षकों तथा शिक्षार्थियों के लिए विभिन्न प्रकार की आचार संहिता बनाई जाती थी जिससे कि शिक्षण प्रक्रिया प्रभावशाली बन सके।

वर्तमान समय में इस प्रक्रिया को सौभाग्य शिक्षण के रूप में जाना गया। वर्तमान में शिक्षा की अवधारणा का उदय हुआ जिसमें यह निश्चित किया गया कि शिक्षण प्रक्रिया को उपयोगी एवं प्रभावशाली बनाने के लिए शिक्षक एवं छात्र दोनों की ही सहभागिता आवश्यक है। इसके विपरीत स्थिति में शिक्षण प्रक्रिया प्रभावशाली सिद्ध नहीं होगी।

सहभागी शिक्षण का अर्थ

सहभागी शिक्षण का सामान्य अर्थ शिक्षक एवं शिक्षार्थी की सहभागिता से लिया जाता है। शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षार्थी भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि एक शिक्षक। उदाहरण के लिए एक शिक्षक कक्षा में पूर्ण मनोयोग से शिक्षण कार्य कर रहा है। वह छात्रों से प्रश्न पूछ कर श्यामपट्ट पर लेखन करवा कर, पाठ को पढ़वा कर एवं पृष्ठ पोषण प्रदान करके उनका सहयोग प्राप्त कर रहा है। इस प्रकार दोनों पक्ष शिक्षण प्रक्रिया में एक-दूसरे को सहयोग दे रहे हैं। शिक्षक प्रश्न पूछता है तो छात्र उसका उत्तर देता है। शिक्षक निर्देश देता है तो छात्र उसका पालन करता है। शिक्षक पाठ को अच्छी तरह से समझाने के लिए गतिविधि जैसे फ्लैश कार्ड, चार्ट पेपर पर चित्र के माध्यम से, श्यामपट्ट पर अभ्यास कार्य के द्वारा ,नाटक मंचन आदि करा कर अपने शिक्षण को रोचक वास्तविकता से युक्त बनाता है।

सहभागी शिक्षण की परिभाषाएं

प्रोफेसर श्री कृष्ण दूबे के शब्दोंसहभागी शिक्षण का आशय उस शिक्षण प्रक्रिया से है जिसमें शिक्षक एवं शिक्षार्थी की पूर्ण सहभागिता निश्चित होती है तथा सहभागिता द्वारा ही शिक्षण प्रक्रिया प्रभावशाली एवं उद्देश्य पूर्ण बनती है”,।

श्रीमती आरके शर्मा के अनुसार “, जिस शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षार्थी का सहयोग प्राप्त करके उसे यह अनुभव कराया जाता है कि वह इस शिक्षण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पक्ष है वह सहभागी शिक्षण कहलाता है “,।

इस प्रकार के शिक्षण में शिक्षक और छात्र के मध्य एक शैक्षिक संबंध में बन जाता है जिसमें शिक्षक और छात्र दोनों मिलकर शिक्षण गतिविधि को पूर्ण करते हैं और ज्ञान प्राप्त करते हैं।

सहभागी शिक्षण के उद्देश्य –

  • विषय वस्तु की प्रस्तुति को सरल एवं बोधगम्य में बनाने के लिए।
  • छात्रों में चिंतन मनन कल्पना तर्क जिज्ञासा आधी प्रवृत्तियों का विकास करना।
  • छात्रों का चहुमुखी विकास करना।
  • विषय वस्तु को छात्रों के मानसिक अनुकूल बनाना।
  • शिक्षक एवं छात्र दोनों को ही क्रियाशील बनाना छात्रों को स्थाई ज्ञान प्रदान करना।
  • कक्षा के वातावरण को रुचिकर एवं आनंददाई बनाना ।
  • छात्रों को पाठ्यक्रम के साथ जोड़ना।

सहभागी शिक्षण हेतु किए जाने वाले क्रियाकलाप :-

  • श्यामपट्ट पर शब्दों का मिलान कराना तथा चित्र बनवाने इत्यादि।
  • कहानी, नाटक का मंचन, छात्रों की सहभागिता से यथा- छात्रों को कहानी, नाटक का पात्र बना कर व पात्रों में संवाद बुलवा कर ।
  • समूह में विभाजित कर विषयगत जानकारी प्राप्त करना।