शिक्षा मनोविज्ञान की विधियां (Methods of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान की विधियां (Methods of Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान, विज्ञान की विधियों का प्रयोग करता है । विज्ञान की विधियों की मुख्य विशेषता है : विश्वसनीयता, यथार्थता, वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता । शिक्षा मनोवैज्ञानिक अपने शोध कार्यों से अपनी समस्याओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखते हैं और उनका समाधान करने के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करते हैं।

शिक्षा मनोविज्ञान की विधियां-

शिक्षा मनोविज्ञान में अध्ययन और अनुसंधान के लिए सामान्य रूप से जिन विधियों का प्रयोग किया जाता है उन को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है ।

(1) आत्मनिष्ठ विधियां (Introspective Method):-

1.1 आत्म निरीक्षण विधि (Introspective Method )
1.2 गाथा वर्णन विधि (Anecdotal Method)

(2) वस्तुनिष्ठ विधियां (Objective Methods):-

2.1 प्रयोगात्मक विधि ( Experimental method)
2.2 निरीक्षण विधि (observational method)
2.3 जीवन इतिहास विधि (case history method )
2.4 उपचारात्मक विधि (clinical metbod)
2.5 मनोविश्लेषण विधि (Psycho analysis method )
2.6 तुलनात्मक विधि (comparative method )
2.7 परीक्षण विधि (test method)
2.8 साक्षात्कार विधि (Interview method )
2.9 प्रश्नावली विधि (Questionnaire method )

आत्म निरीक्षण विधि :-

मस्तिष्क द्वारा अपनी स्वयं की क्रियाओं का निरीक्षण करना निरीक्षण विधि कहलाता है।

परिचय :-

आत्म निरीक्षण मनोविज्ञान की परंपरा गतिविधि है । इसका नाम इंग्लैंड के विख्यात दार्शनिक लोक (Locke) से संबंध है। जिसने इसकी परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में दी थी “मस्तिष्क द्वारा अपनी स्वयं की क्रियाओं का निरीक्षण करना आत्मनिरीक्षण कहलाता है”। पूर्व काल के मनोवैज्ञानिक अपनी मानसिक क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए इस विधि पर निर्भर थे। वे इसका प्रयोग अपने अनुभवों का पुनः स्मरण और भावनाओं का मूल्यांकन करने के लिए किया करते थे । वह सुख और दुख क्रोध और शांति घृणा और प्रेम के समय अपनी भावना और मानसिक दशाओं का निरीक्षण करके उनका वर्णन करते थे।

आत्म निरीक्षण का अर्थ :-

Introspection का अर्थ होता है ‘ to look within or Self Observation’ जिसका अभिप्राय है। अपने आप में देखना या आत्मनिरीक्षण करना । इसकी व्याख्या करते हुए बीएन झा ने लिखा है “आत्म निरीक्षण अपने स्वयं के मन की निरीक्षण करने की प्रक्रिया है यह एक प्रकार का आत्मनिरीक्षण है जिसमें हम किसी मानसिक क्रिया के समय अपने मन में उत्पन्न होने वाले स्वयं की भावनाओं और सब प्रकार की प्रतिक्रियाओं का निरीक्षण विश्लेषण और वर्णन करते हैं” ।

आत्म निरीक्षण विधि के गुण:-

  • मनोविज्ञान के ज्ञान में वृद्धि :- डग्लस और हॉलैंड के अनुसार मनोविज्ञान में इस विधि का प्रयोग करके हमारे मनोविज्ञान के ज्ञान में वृद्धि की है।
  • यंत्र व सामग्री की आवश्यकता नहीं:- रॉस के अनुसार यह विधि खर्चीली नहीं है। क्योंकि इसमें किसी विशेष यंत्र यह सामग्री की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं :- यह विधि बहुत सरल है । क्योंकि इसमें किसी प्रयोगशाला की आवश्यकता नहीं है। रॉस के शब्दों में “मनोवैज्ञानिक का स्वयं का मस्तिष्क प्रयोगशाला होता है और क्योंकि वह सदैव उसके साथ रहता है। इसलिए वह अपनी इच्छा अनुसार कभी भी निरीक्षण कर सकता है”।
  • अन्य विधियों में सहायक :- डग्लस व हॉलैंड के अनुसार यह विधि अन्य विधियों द्वारा प्राप्त किए गए तथ्यों नियमों और सिद्धांतों की व्याख्या करने में सहायता देती है।

विधि के दोष :-

  • वैज्ञानिकता का अभाव :- यह विधि वैज्ञानिक नहीं है। क्योंकि इस विधि द्वारा प्राप्त निष्कर्षों का किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा परीक्षण नहीं की जा सकता।
  • मन द्वारा मन का निरीक्षण असंभव है:- इस विधि में मन के द्वारा मन का निरीक्षण किया जाता है जो कि सर्वथा असंभव है।
  • ध्यान का विभाजन :- इस विधि का प्रयोग करते समय व्यक्ति का ध्यान / रहता है। क्योंकि एक और तो उसे मानसिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करना पड़ता है और दूसरी ओर आत्मनिरीक्षण करना पड़ता है। ऐसी दशा में व्यक्ति का ध्यान विभाजित हो जाता है।
  • मानसिक प्रक्रिया का निरीक्षण असंभव :- डग्लस व हालैंड के अनुसार मानसिक दशाओ व प्रतिक्रियाओं में इतनी शीघ्रता से परिवर्तन होते हैं कि उनका निरीक्षण करना प्रायः असंभव हो जाता है।
  • मस्तिष्क की वास्तविक दशा का ज्ञान असंभव है :– इस विधि द्वारा मस्तिष्क की वास्तविक दिशा का ज्ञान प्राप्त करना असंभव है उदाहरण के रूप में यदि किसी मनोवैज्ञानिक को अपने क्रोध का निरीक्षण करना है तो जैसे ही वह व्यक्ति अपने क्रोध पर ध्यान आकर्षित करता है तो उसका क्रोध क्षण भर में शांत हो जाता है।
  • रॉस के अनुसार यह विधि असामान्य व्यक्तियों, असभ्य मनुष्य, मानसिक रोगियों, बालको और पशुओं के लिए अनुपयुक्त है । क्योंकि उनमें मानसिक क्रियाओं का निरीक्षण करने की क्षमता नहीं होती। असामान्य व्यक्ति व बालकों के लिए अनुपयुक्त

गाथा वर्णन विधि :-

पूर्व अनुभव या व्यवहार का लेखा तैयार करना गाथा वर्णन विधि कहलाता है।

इस विधि में व्यक्ति अपने किसी पूर्व अनुभव या व्यवहार का वर्णन करता है । मनोवैज्ञानिक उसे सुनकर एक रिकॉर्ड तैयार करता है और उसके आधार पर अपने निष्कर्ष निकालता है । इस विधि का मुख्य दोष यह है कि व्यक्ति अपने पूर्व अनुभव या व्यवहार का ठीक-ठीक पुनः स्मरण नहीं कर पाता । इसके अलावा वह उससे संबंधित कुछ बातों को भूल जाता है और कुछ को अपनी ओर से जोड़-तोड़ करता है। इसलिए इस विधि को और अविश्वसनीय बताते हुए स्किनर ने लिखा है की “गाथा वर्णन विधि की आत्मीयता के कारण इसके परिणाम पर विश्वास नहीं किया जा सकता”।

प्रयोगशाला विधि :-

पूर्व निर्धारित दशाओं में मानव व्यवहार का अध्ययन प्रयोगात्मक विधि के अंतर्गत किया जाता है।

प्रयोगात्मक विधि का अर्थ :-

प्रयोगात्मक विधि एक प्रकार की नियंत्रित निरीक्षण (Controlled Observation) विधि है। इस विधि में प्रयोग कर्ता स्वयं अपने द्वारा निर्धारित की हुई परिस्थितियों या वातावरण में किसी व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करता है। या किसी समस्या के संबंध में तथ्य एकत्र करता है। मनोवैज्ञानिक ने इस विधि का प्रयोग करके ना केवल बालकों और व्यक्तियों के व्यवहार अपितु चूहा , बिल्लियों आदि पशुओं के व्यवहार का भी अध्ययन किया है। इस प्रकार के प्रयोग का उद्देश्य बताते हुए क्रो एंड क्रो ने लिखा है “मनोवैज्ञानिक प्रयोग का उद्देश्य किसी निश्चित परिस्थिति या दशाओं में मानव व्यवहार से संबंधित किसी विश्वास या विचार का परीक्षण करना होता है”।

प्रयोगात्मक विधि के गुण :-

  • यह वैज्ञानिक विधि है। :- प्रयोगात्मक विधि एक वैज्ञानिक विधि है। क्योंकि इसके द्वारा सही आंकड़े और तथ्य एकत्रित किए जा सकते हैं।
  • उपयोगी तथ्यों पर प्रकाश :- क्रो एंड क्रो के अनुसार “इस विधि में अनेक नवीन और उपयोगी तथ्यों पर प्रकाश डाला है” जैसे शिक्षण के लिए किन उपयोगी विधियों का प्रयोग करना चाहिए? कक्षा में छात्रों की अधिकतम संख्या कितनी होनी चाहिए? पाठ्यक्रम का निर्माण किन सिद्धांतों के आधार पर करना चाहिए? छात्रों के ज्ञान का ठीक मूल्यांकन करने के लिए किन विधियों का प्रयोग करना चाहिए?
  • विश्वसनीय निष्कर्ष :– इस विधि द्वारा प्राप्त किए जाने वाले निष्कर्ष सत्य और विश्वसनीय होते हैं।।
  • निष्कर्षों की जांच संभव है :- इस विधि द्वारा प्राप्त किए गए निष्कर्षों की सत्यता की जांच प्रयोग को दौरा कर की जा सकती है।

प्रयोगात्मक विधि के दोष :-

  • प्रयोज्य की मानसिक दशा का ज्ञान संभव :- जिस व्यक्ति पर प्रयोग किया जाता है। उसके व्यवहार का स्वभाविक और आडंबरपूर्ण हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतः उसकी मानसिक दशा का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना असंभव हो जाता है।
  • प्रयोज्य की आंतरिक दशाओं का नियंत्रण असंभव है:- प्रयोज्य की मानसिक दशा को प्रभावित करने वाले सब बाहरी कारकों पर पूर्ण नियंत्रण करना संभव हो सकता है। पर उसकी आंतरिक दशाओं पर नियंत्रण करना असंभव होता है। ऐसी स्थिति में प्रयोग करता द्वारा प्राप्त किए जाने वाले निष्कर्ष पूर्ण रूप सत्य और विश्व से नहीं माने जा सकते।
  • प्रयोज्य का सहयोग प्राप्त करने में कठिनाई :- जिस व्यक्ति पर प्रयोग किया जाना है उसे प्रयोज्य कहते है। प्रयोज्य में प्रयोग को लेकर कितनी रूचि है। यह इस बात पर भी निर्भर करता है। वह प्रयोग करता को कितना सहयोग कर रहा है।
  • प्रयोग में कृत्रिमता स्वभाविक है :- प्रयोग के लिए परिस्थितियों का निर्माण चाहे जितनी भी सावधानी से किया जाए पर उनमें थोड़ी बहुत कृत्रिमता का आ जाना स्वभाविक है ।
  • कृत्रिम परिस्थितियों का नियंत्रण असंभव व अनुचित :- प्रत्येक प्रयोग के लिए ना तो कृत्रिम परिस्थितियों का निर्माण किया जाना संभव है और ना किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए बालकों में भय, क्रोध या कायरता उत्पन्न करने के लिए परिस्थितियों का निर्माण किया जाना सर्वथा अनुचित है।

निरीक्षण विधि :-

व्यवहार का निरीक्षण करके मानसिक दशा को जानना निरीक्षण विधि कहलाता है।

निरीक्षण विधि का अर्थ:- निरीक्षण का सामान्य अर्थ है ‘ध्यान पूर्वक देखना’ । हम किसी व्यक्ति के व्यवहार आचरण क्रियाओं प्रतिक्रिया आदि को ध्यानपूर्वक देख कर उसकी मानसिक दशा का अनुमान लगा सकते हैं । उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति जोर-जोर से बोल रहा है और उसके नेत्र लाल हैं तो हम जान जाते हैं कि वह व्यक्ति क्रोध मे है। Kolesnik के अनुसार निरीक्षण दो प्रकार का होता है औपचारिक और अनौपचारिक
औपचारिक निरीक्षण नियंत्रित दशाओं में और अनौपचारिक निरीक्षण अनियंत्रित दशाओं में किया जाता है। इनमें से अनौपचारिक निरीक्षण शिक्षक के लिए अधिक उपयोगी होता है । उसे कक्षा में और कक्षा के बाहर अपने छात्रों के व्यवहार का निरीक्षण करने के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं । वह इस निरीक्षण के आधार पर उसके व्यवहार के प्रति मानव का ज्ञान प्राप्त करके उसको उपयुक्त निर्देशन दे सकता है।

निरीक्षण विधि के गुण:-

  • बालकों का विकास उचित दिशा में किया जा सकता है :- कक्षा और खेल के मैदान में बालकों के सामान्य व्यवहार सामाजिक संबंधों और जन्मजात गुणों का निरीक्षण करके उनका उचित दिशाओं में विकास किया जा सकता है।
  • शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम आदि में परिवर्तन:- विद्यालय के शिक्षक निरीक्षक और प्रशासक समय की मांगों और समाज की दशाओं का निरीक्षण करके शिक्षा के उद्देश्य शिक्षण विधियों पाठ्यक्रम आदि में परिवर्तन करते हैं।
  • बाल अध्ययन के लिए उपयोगी :- यह विधि बालकों का अध्ययन करने के लिए विशेष रूप से उपयोगी है Garrett के अनुसार “, कभी-कभी बाल मनोवैज्ञानिक को केवल यही विधि उपलब्ध होती है “,

दोष :-

  • प्रयोज्य का अस्वाभाविक व्यवहार :- जिस व्यक्ति के व्यवहार का निरीक्षण किया जाता है । वह स्वाभाविक ढंग का परित्याग करके कृत्रिम और अस्वाभाविक विधि अपना लेता है।
  • असत्य निष्कर्ष :- किसी बालक या समूह का निरीक्षण करते समय निरीक्षण कर्ता को अनेक कार्य एक साथ करने पड़ते हैं। जैसे बालक के अध्ययन किए जाने के कारण को ध्यान में रखना, विशिष्ट दशाओं में उसके व्यवहार का अध्ययन करना, उसके व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारणों का ज्ञान प्राप्त करना, उसके व्यवहार के संबंध में अपने निष्कर्षों का निर्माण करना आदि।
  • स्वाभाविक त्रुटिया व अविश्वसनीयता :– अपनी स्वाभाविक त्रुटियों के कारण वैज्ञानिक विधि के रूप में निरीक्षण विधि अविश्वसनीय है।
  • आत्मनिष्टता :- आत्म निरीक्षण विधि के समान इस विधि में आत्मनिष्टता का दोष पाया जाता है।

जीवन इतिहास विधि :-

जीवन इतिहास द्वारा मानव व्यवहार का अध्ययन जीवन इतिहास विधि के अंतर्गत किया जाता है। बहुत से मनोवैज्ञानिक का अनेक प्रकार के व्यक्तियों से पाला पड़ता है । इनमें से कोई अपराधी, कोई मानसिक रोगी, कोई झगड़ालू , कोई समाज विरोधी कार्य करने वाला और कोई समस्यात्मक बालक होता है । मनोवैज्ञानिक के विचार से व्यक्ति का भौतिक पारिवारिक या सामाजिक वातावरण उसमें मानसिक असंतुलन उत्पन्न कर देता है । जिसके फलस्वरूप वह असामाजिक व्यवहार करने लगता है । इसका वास्तविक कारण जानने के लिए वह व्यक्ति के पूर्व इतिहास की कड़ियों को जोड़ता है। इस उद्देश्य से वह व्यक्ति उसके माता-पिता शिक्षकों संबंधियों पड़ोसियों मित्रों आदि से भेंट करके पूछताछ करता है ।

इस प्रकार वह व्यक्ति के वंशानुक्रम पारिवारिक और सामाजिक वातावरण , रूचियों , क्रियाओं , शारीरिक स्वास्थ्य, शैक्षिक और संवेगात्मक विकास के संबंध में तथ्य एकत्र करता है। इन तथ्यों की सहायता से वह उन कारणों की खोज कर लेता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति मनोविकारों का शिकार बनकर अनुचित आचरण करने लगता है । इस प्रकार इस विधि का उद्देश्य व्यक्ति या किसी विशिष्ट व्यवहार के कारण की खोज करना है । क्रो एंड क्रो के अनुसार ” जीवन इतिहास विधि का मुख्य उद्देश्य किसी कारण का निदान करना है”।

उपचारात्मक विधि :-

उपचारात्मक विधि का अर्थ और प्रयोजन स्पष्ट करते हुए स्किनर महोदय ने लिखा है ” उपचारात्मक विधि साधारणत विशेष प्रकार के सीखने, व्यक्तित्व , आचरण संबंधी जटिलताओं का अध्ययन करने और अनेक अनुकूल विभिन्न प्रकार की उपचारात्मक विधियों का प्रयोग करने के लिए काम में लाई जाती है। इस विधि का प्रयोग करने वाले का उद्देश्य यह मालूम करना होता है कि व्यक्ति की विशिष्ट आवश्यकता क्या है? उसने उत्पन्न होने वाले जटिलताओं के क्या कारण हैं ? और उनको दूर करके व्यक्ति को किस प्रकार सहायता दी जा सकती है?

  • पढ़ने में बहुत कठिनाई अनुभव करने वाले बालक।
  • बहुत हकलाने वाले बालक।
  • बहुत पुरानी अपराधी प्रवृत्ति वाले बालक गंभीर संवेगों के शिकार होने वाले बालक।

मनोविश्लेषण विधि :-

व्यक्ति के अचेतन मन का अध्ययन करके उपचार करना मनोविश्लेषण विधि के अंतर्गत किया जाता है। इस विधि का जन्मदाता वियना का विख्यात चिकित्सक सिगमंड फ्रायड को माना जाता है । उसने बताया कि व्यक्ति के अचेतन मन का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है । यह मन उसके अतृप्त इच्छाओं का पुंज होता है और निरंतर क्रियाशील रहता है। फलस्वरूप व्यक्ति की अतृप्त इच्छाएं अवसर पाकर प्रकाश में आने के चेष्टा करती है। जिससे वह अनुचित व्यवहार करने लगता है । अतः इस विधि के द्वारा व्यक्ति के अचेतन मन का अध्ययन करके उसकी अतृप्त इच्छाओं की जानकारी प्राप्त की जाती है। उसके उपरांत इच्छाओं का परिष्कार या मॉडिफिकेशन के द्वारा व्यक्ति का उपचार किया जाता है। और इस प्रकार उसके व्यवहार को उत्तम बनाने का प्रयास किया जाता है।

इस विधि की समीक्षा करते हुए वुडवर्थ महोदय ने लिखा है कि इस ” विधि में बहुत समय लगता है । अतः इसे तब तक आरंभ नहीं करना चाहिए। जब तक रोगी इसको निभाने के लिए तैयार ना हो। क्योंकि यदि इसी बीच में ही छोड़ दिया जाता है तो रोगी पहले से भी बदतर हालत में पड़ जाता है “। मनोविश्लेषण भी इस विधि को आरोग्य प्रदान करने वाले नहीं मानते पर इसके कारण कई मानसिक रोगी चिकित्सा पूर्व की स्थिति से अच्छी दशा में व्यवहार करते देखे गए हैं।

तुलनात्मक विधि :-

व्यवहार संबंधित समानता और असमानताओं का अध्ययन तुलनात्मक विधि कहलाता है। इस विधि का प्रयोग अनुसंधान के लगभग सभी क्षेत्रों में किया जाता है । जब भी दो व्यक्तियों का समूह का अध्ययन किया जाता है । तब उनके व्यवहार से संबंधित समानता और असमानताओं को जानने के लिए इस विधि का निश्चित रूप से प्रयोग किया जाता है। मनोवैज्ञानिकों ने इस विधि का प्रयोग करके अनेक उपयोगी तुलनाऐ की है। जैसे पशु और मानव व्यवहार की तुलना, प्रजातियों की विशेषताओं की तुलना, विभिन्न वातावरण में पाले गए बालकों की तुलना आदि । इन तुलनाओं द्वारा उन्होंने अनेक आश्चर्यजनक तथ्यों का उद्घाटन करके हमारे ज्ञान और मनोविज्ञान की परिधि का विस्तार किया है।

परीक्षण विधि :-

व्यक्तियों की विभिन्न योग्यताएं जानने के लिए परीक्षा ली जाती है इसे परीक्षण विधि कहते है। यह विधि आधुनिक युग की देन है । और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न उद्देश्यों से इसका प्रयोग किया जा रहा है । इस समय तक अनेक प्रकार की परीक्षण विधियों का निर्माण किया जा चुका है । जैसे बुद्धि परीक्षा, व्यक्तित्व परीक्षा, ज्ञान परीक्षा, रुचि परीक्षा आदि इन परीक्षाओं के परिणाम पूर्णता सत्य विश्वसनीय और प्रमाणिक होते हैं । अतः इनके आधार पर परिणामों का शैक्षिक, व्यवसायिक और अन्य प्रकार का निर्देशन किया जाता है।

साक्षात्कार विधि :-

व्यक्तियों से भेंट करके समस्या संबंधित तथ्य एकत्र करना साक्षात्कार विधि कहलाती है। इस विधि में प्रयोगकर्ता किसी विशेष समस्या का अध्ययन करते समय उससे संबंधित व्यक्तियों से भेंट करता है और उस समस्या के बारे में विचार विमर्श करके जानकारी प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए कोठारी कमीशन के सदस्यों ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पूर्व भारत का भ्रमण करके समाज सेवकों , वैज्ञानिकों उद्योगपतियों , विभिन्न विषयों के विद्वान और शिक्षा में रुचि रखने वाले पुरुषों और स्त्रियों से साक्षात्कार किया। इस प्रकार कमीशन ने कुल मिलाकर लगभग 9000 व्यक्ति साक्षात्कार करके शिक्षा की समस्या पर उनके विचारों की जानकारी प्राप्त की ।

प्रश्नावली विधि :-

प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करके समस्या संबंधित तथ्य एकत्र करना प्रश्नावली विधि के अंतर्गत आता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि प्रयोग करता किसी शिक्षा समस्या के बारे में अनेक व्यक्तियों के विचारों को जानना चाहता है। उन सब से साक्षात्कार करने के लिए उसे पर्याप्त धन और समय की आवश्यकता होती है। इन दोनों में बचत करने के लिए वह समस्या से संबंधित कुछ प्रश्नों की एक प्रश्नावली तैयार करके उसके पास भेज देता है। उनके प्राप्त होने वाले उत्तरों का यह अध्ययन और वर्गीकरण करता है फिर उनकी आधार पर अपने निष्कर्ष निकालता है। उदाहरण के लिए राधाकृष्णन कमीशन ने विश्वविद्यालय शिक्षा से संबंधित एक प्रश्नावली तैयार करके शिक्षा विभागों के पास भेजी थी। उसे लगभग 600 व्यक्तियों के उत्तर प्राप्त हुए जिनको उसने अपने प्रतिवेदन के लेखन में प्रयोग किया था। इस विधि का दोस्त उल्लेख करते हुए क्रो एंड क्रो ने लिखा है। इस विधि को बहुत वैज्ञानिक नहीं समझा जा सकता।संभव है कि प्रश्न सुनियोजित प्रयास विवेकपूर्ण या निश्चित उत्तर प्रदान करने वाले ना हो। संभव है कि उत्तर देने वाले व्यक्ति प्रश्नों के गलत अर्थ लगाएं और ठीक उत्तर ना दे सके। जिसके फलस्वरूप संकलित आंकड़ों की विश्वसनीयता कम हो सकती है। संभव है कि जिन व्यक्तियों के पास प्रश्नावली भेजी जाए उनमें से बहुत से उनको वापस ना करें।

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