शिक्षण विधि तथा प्रविधियां (Teaching Methods and Techniques)

इस लेख में हम शिक्षण विधि तथा प्रविधियाँ (Teaching Methods and Techniques)को विस्तार से चर्चा करेंगे जो कि शिक्षक भर्ती परीक्षाओं हेतु महत्वपूर्ण है l जैसे DSSSB, KVS, CTET, REET, UPTET आदि l Teaching Methods and Techniques

शिक्षण प्रविधियां :-

हम सभी के विद्यालय महाविद्यालय स्तरों पर पढ़ाई करते समय कुछ पसंदीदा अध्यापक रहे होंगे । उनकी पढ़ाई गई विषय वस्तु हमें आज तक याद है । जानते हैं ऐसा क्यों? क्योंकि उनके पढ़ाने का तरीका समझाने का ढंग इतना अच्छा तथा सरल था कि उनके पढ़ाए गए अध्याय हुआ पाठों को आज भी हम अपने छोटो को आसानी से समझा सकते हैं । यह पढ़ाने का तरीका ही शिक्षण विधि कहलाता है।Teaching Methods and Techniques

शिक्षण विधि वास्तव में शिक्षण प्रक्रिया की शुरुआत होती है।शिक्षण कैसे हो? इसका उत्तर शिक्षण विधि द्वारा ही प्राप्त किया जाता है । पाठ्यवस्तु कितनी समझ में आई ,और कितनी और अच्छी तरीके से समझायी जा सकती है । इसका निर्धारण शिक्षण विधि द्वारा किया जाता है।

परिभाषाएं:-

थ्रींग के अनुसार :- “, शिक्षक शिक्षण प्रविधियां के द्वारा अपने छात्रों को कार्य करने के योग्य बनाता है और स्वयं यह दर्शाने में लगा रहता है कि इस कार्य को कैसे किया जाएगा साथ ही इस बात के लिए सतर्क रहता है कि वह इसे करें “, ।

एम पी मॉफेट ” शिक्षण प्रविधियां का प्रयोग शिक्षक द्वारा अध्ययन करने के लिए दिए गए निर्देशात्मक तरीके में होता है “।

एसके अग्रवाल “, छात्रों की उत्तर रूपी आधारशिला पर शिक्षक अपनी पाठ रूपी इमारत खड़ी करता है ,और अपना अभीष्ट सिद्ध करता है।

शिक्षण विधियों निम्नलिखित हैं:-

  1. प्रश्नोत्तर प्रविधि
  2. विवरण प्रविधि
  3. वर्णन प्रविधि
  4. व्याख्यान प्रविधि
  5. स्पष्टीकरण प्रविधि
  6. कहानी कथन प्रविधि
  7. निरीक्षण एवं अवलोकन प्रविधि
  8. उदाहरण प्रविधि
  9. खेल गतिविधि प्रविधि
  10. प्रयोगात्मक कार्य प्रविधि
  11. वाद-विवाद प्रविधि
  12. कार्यशाला प्रविधि
  13. भ्रमण प्रविधि
  14. समूह चर्चा प्राविधि

(1) प्रश्नोत्तर प्रविधि :-

जिज्ञासा मानव स्वभाव की पहचान होती है । सदियों से मानव ने अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए लगातार नित नए – नए प्रश्न किए, प्रयोग किए तथा अविष्कार किए इन सब के द्वारा अपने ज्ञान में वृद्धि की है ।
जिज्ञासा ही प्रश्न पूछने का मूल आधार होता है । शिक्षण कार्य की शुरुआत प्रश्न विधि से किया जाए तो शिक्षक अपने समस्त शिक्षण योजना को नियोजित स्वरूप दे सकता है।
वास्तव में प्रश्न प्रविधि के जन्मदाता सुकरात को ही माना जाता है । उन्होंने इसके 3 सोपान बताएं थे :-
निरीक्षण
अनुभव
परीक्षण

पारकर महोदय के अनुसार “, प्रश्न, आदत कौशल के स्तर से ऊपर उठकर समस्त क्रियाओं, की कुंजी है।

प्रश्न विधि का महत्व?

  • नवीनता
  • जिज्ञासा
  • रुचि व एकाग्रता
  • चिंतन
  • पाठ विस्तार
  • शिक्षण मूल्यांकन
  • सक्रियता
  • कक्षा अनुशासन
  • नवीन ज्ञान से सहसंबंध

प्रश्न प्रविधि शिक्षण को सहज व क्रमबद्ध करती है इसके लिए कुछ बातें जानने जरूरी होती हैं :-

  • प्रश्न सरल तथा स्वस्थ होने चाहिए।
  • प्रश्न संपूर्ण कक्षा से किया जाना चाहिए।
  • प्रश्न शिक्षण स्तर के अनुकूल होने चाहिए।
  • प्रश्न पाठ्यवस्तु से संबंध होना चाहिए।
  • प्रश्नों में क्रमबद्धता होनी चाहिए।।
  • प्रश्न पूर्व ज्ञान से जोड़ते हुए पाठ का विस्तार करने वाला होना चाहिए।
  • प्रश्न बालक को क्रियाशील रखने वाला होना चाहिए।
  • प्रश्नों के माध्यम से चलने वाले शिक्षण प्रभावशाली होता है।

प्रश्नों के प्रकार:-

  • प्रस्तावना प्रश्न
  • विचारात्मक प्रश्न
  • बोध प्रश्न
  • विकासात्मक प्रश्न
  • समस्या प्रश्न
  • तुलनात्मक प्रश्न
  • पुनरावृति प्रश्न

काऊलर महोदय के अनुसार ” शिक्षण मुख्य रूप से प्रश्नों के द्वारा होना चाहिए”।

प्रश्न पूछने के बाद उत्तर की अपेक्षा होती है। एक छात्र को उत्तर देते समय निम्नलिखित तथ्यों का पालन होना चाहिए :-

  • उत्तर देते समय छात्रों को सीधा खड़ा होकर उचित स्वर में बोलना चाहिए।
  • एक समय में एक ही छात्र उत्तर दें।
  • उत्तर देने के लिए प्रतिभाशाली, कमजोर दोनों छात्रों को प्रेरित करना चाहिए।
  • अशुद्ध, स्पष्ट उत्तर पर उत्तेजित प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए उनके गलत होने के कारणों का शिक्षक अवश्य स्पष्ट करें।
  • सही उत्तरों की प्रशंसा करने चाहिए ताकि अन्य छात्र भी प्रेरित हो सकें।
  • जटिल प्रश्नों के उत्तर को शिक्षक स्वयं पाठ्य सहगामी सामग्री से स्पष्ट करें।

स्पष्ट है कि उत्तर विधि भी अधिगम प्रक्रिया की दिशा बोधक होती है। पशु एवं उनके उपयोग के बारे में शिक्षण करना है ,तो प्रश्नोत्तर विधि की रूपरेखा पर विचार करना चाहिए।

(2) विवरण विधि:-

शिक्षण की ऐसी विधि जिसमें पाठ्यवस्तु प्रसंग ,घटना ,स्थान का सरल भाषा में कथन किया जाता है, इसलिए इसे कथन विधि भी कहते हैं । इसमें अज्ञात से ज्ञात की स्थिति की ओर अग्रसर होते हैं।

उदाहरण :- विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों के बारे में जैसे – कुतुब मीनार, बुलंद दरवाजा, ताज महल आदि के बारे में बताना कि वह कहां स्थित है ?, किसने बनवाया? किस लिए प्रसिद्ध है? यह विवरण विधि के अंतर्गत आता है।

विवरण की उपयोगिता:-

  • अनुभवों को मूर्त रूप से प्रदान करना
  • बोद्ध विस्तार
  • तथ्यात्मक ज्ञान
  • मानसिक क्षमता
  • ध्यान केंद्रीकरण
  • डॉ रवि शंकर मेनन के अनुसार ” विवरण से तात्पर्य क्रमानुसार वर्णन प्रक्रिया से होता है “

विवरण प्रविधि द्वारा शिक्षण करते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए-

  • विवरण विषय वस्तु से संबंध होना चाहिए
  • विवरण सरल व स्पष्ट होना चाहिए
  • विवरण चित्र,मॉडल तथा श्यामपट्ट के द्वारा प्रस्तुत किया जाना चाहिए
  • विवरण अत्यधिक रूप से बड़ा ना हो हो सके तो इसे खंडों में प्रस्तुत करना चाहिए
  • विवरण छात्र स्तर के अनुकूल होना चाहिए
  • विवरण के अंत में एक या दो प्रश्न पूछकर छात्रों के अधिगम स्तर का पता लगाना चाहिए

(3) वर्णन विधि:-

शिक्षण की इस प्रविधि में विषय वस्तु का विस्तार से कथन किया जाता है । ताकि छात्र को पाठ अच्छी तरह से समझ में आ जाए ।परंतु शिक्षक इस विधि में ज्यादा सक्रिय रहता है, छात्र नहीं । अगर शिक्षक द्वारा रुचिपूर्ण ढंग से वर्णन विधि प्रस्तुत किया जाए तो छात्र भी सक्रियता से भाग लेते हैं । और संप्रेषण प्रभावी होता है।

वर्णन विधि को प्रस्तुत करने के तरीके

  • चित्र मॉडलों द्वारा
  • भ्रमण विधि द्वारा
  • करके या प्रयोग करके

विवरण तथा वर्णन विधि में अंतर?

वर्णन और विभिन्न विधि एक समान नहीं होती । विवरण सतही होता है ,जबकि वर्णन में विषय वस्तु व्यापक ढंग से गहराई में प्रस्तुत की जाती है । यानी वर्णन विधि मे शिक्षक विषय को चित्र,मॉडल पूरे हाव भाव के साथ चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करता है । यह मौखिक लिखित दोनों तरह से किया जाता है ।विवरण के आगे की स्थिति वर्णन होती है । इसका स्वरूप संश्लेषणात्मक होता है।

वर्णन विधि के दौरान शिक्षक को निम्नलिखित बातों पर ध्यान रखना चाहिए :-

  • वर्णन विषय वस्तु से संबंधित होना चाहिए
  • वर्णन की भाषा-शैली सरल स्पष्ट होनी चाहिए
  • वर्णन समग्र रूप से किया जाना चाहिए
  • वर्णन स्तर अनुकूल होना चाहिए

(4) व्याख्यान विधि :-

किसी भी विषय वस्तु का गहन ढंग से विश्लेषण करना व्याख्यान कहलाता है । इस विधि का प्रयोग ज्यादातर जटिल विषयों को समझाने के लिए तथा उच्च स्तर पर किया जाता है । उदाहरण के तौर पर समास को ले ,इसे समझाना हो तो शिक्षक द्वारा बताया जाएगा की समास दो शब्दों से मिलकर बना है सम+आस । सम का अर्थ होता है समीप या पास और अस का अर्थ होता बैठना l जिस क्रिया में संक्षेपीकरण किया जाए या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर लिखा जाए उसे सामासिक पद कहते हैं।
हम कह सकते हैं कि व्याख्यान विधि में किसी भी प्रसंग को विस्तार से समझाया जाता है।

व्याख्यान विधि को रुचिकर कैसे बनाया जाए?

  • व्याख्यान से पहले उद्देश्य का निश्चित कर लेना चाहिए।
  • व्याख्यान सरल व स्पष्ट भाषा में देना चाहिए।
  • व्याख्यान छात्रों के मानसिक स्तर के अनुकूल होना चाहिए।
  • व्याख्यान छात्रों को समझ मैं आ रहा है या नहीं इसका परीक्षण बीच-बीच में करना चाहिए।
  • व्याख्यान देने के बाद शिक्षक रुक-रुक कर प्रश्न पूछकर ज्ञात करें कि सीखने की क्रिया हो रही है अथवा नहीं।
  • व्याख्यान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए शिक्षक को चित्र मॉडलों उदाहरणों एवं तुलना के तरीकों का समावेश करना चाहिए।
  • व्याख्यान विधि से पढ़ाते समय विषय की मूलभूत बातों को बताकर विद्यार्थी से पूर्व ज्ञान के आधार पर नवीन चीजों को जानने समझने की ओर प्रेरित करना चाहिए।

व्याख्यान विधि के लाभ :-

  • जटिल व मुश्किल विषय का ज्ञान आसानी से किया जा सकता है।
  • विषय का सरलीकरण हो जाता है।
  • स्वाध्याय की भावना विकसित होती।
  • पाठ के हर पहलू का ज्ञान आसानी से हो जाता।
  • अधिकतम सूचना एवं तथ्यों का ज्ञान होता है।
  • छात्रों में ज्ञान स्थाई रूप से लंबे समय तक बना रहता है।

(5) स्पष्टीकरण प्रविधि:-

किसी वस्तु, विषय या घटना को अच्छी तरह समझाना स्पष्टीकरण कहलाता है । इस विधि को उद्घाटन विधि भी कहा जाता है । यह विधिक ज्यादातर जटिल विषय को सरल रूप मे तथा बोद्धगम्य बनाने के लिए काम में ली जाती है।
शिक्षक को चाहिए कि पाठ्यवस्तु के प्रमुख पक्षों का चयन कर ले और उसके बारे में प्रत्येक बातों को प्रकाशित करें इसके लिए चित्रों,मॉडलों तथा श्यामपट्ट लेखन को माध्यम बनाया जा सकता है ।

स्पष्टीकरण विधि से शिक्षण की सफलता इस बात में निहित होती है, कि शिक्षक को अपने विषय का पूर्ण ज्ञान हो ,ताकि उसे समग्र रूप मे अधिगमकर्ता के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके।
उदाहरण के तौर पर सौरमंडल पढ़ाना हो तो इसमें सौरमंडल का अर्थ उन ग्रहों, तारों के समूह को स्पष्ट करना होगा । फिर प्रत्येक ग्रह तारों की स्थिति प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाना होगा। इसके लिए चित्रो तथा तारामंडल भ्रमण का सहारा लिया जा सकता है।

स्पष्टीकरण विधि को सरल बनाने के लिए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए:-

  • पाठ्यवस्तु को छोटे-छोटे भागों में विभाजित करके उसे तार्किक रूप क्रम में नियोजित कर लेना चाहिए।
  • स्पष्टीकरण की भाषा को सरल व स्पष्ट रखना चाहिए।
  • पाठ्यवस्तु के भ्रामक पक्ष को अच्छी तरह समझाना चाहिए।
  • शिक्षण की अन्य प्रविधियों का प्रयोग भी किया जा सकता है।
  • स्पष्टीकरण के अंत में प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए।

स्पष्टीकरण विधि के लाभ:

  • प्रत्येक पहलू का ज्ञान आसानी से कराया जाता है।
  • क्रमबद्धता तथा तार्किकता का समावेशन होता है।
  • ज्ञान की समग्रता प्रस्तुत की जाती है।
  • प्रत्येक बिंदु का ज्ञान आसानी से प्रदान किया जाता है।

(6) कहानी कथन प्रविधि :-

एक शिक्षक को अपना पाठ शुरू करते समय कहानी का जरूर सहारा लेना चाहिए । जैसे एक राजा था, एक राजकुमारी थी या एक परी थी । जैसे वाक्यों से शुरू होने वाली कहानियां हम सभी ने अपने दादा-दादी, नाना-नानी से सुनी अवश्य होंगे और उसमें बताई गई बातें हम सभी को याद भी हैं यह विद्या, कहानी या कथन विधि कहलाती है। इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि यदि शिक्षण का स्थाई प्रभाव डालना हो तो शिक्षण को कल्पना द्वारा आकर्षक तरीके से कहानी व कथा के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहिए । इसके द्वारा बच्चे जल्दी सीखते हैं। वह इन्हें लंबे समय तक अपने मस्तिष्क में याद भी रखते हैं । कक्षा गत अनुशासन भी बना रहेगा और उसमें जिज्ञासा जागृत होगी । यह विधि मुख्यतः मौखिक विधि कहलाती है।

कहानी कथन प्रविधि का लाभ :-

  • एकाग्रता बनी रहती है कक्षा में
  • कल्पना शक्ति का विकास होता है छात्रों में
  • अधिगम की तीव्रता पाई जाती है

कहानी विधि मनोवैज्ञानिक होने के कारण शिक्षण क्षेत्र में सबसे लोकप्रिय होती है । इसे और भी प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि कुछ बातों का ध्यान रखा जाए।

कहानी विधि को लोकप्रिय बनाने हेतु निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:-

  • कहानी कथन स्तर अनुकूल होने चाहिए।
  • कहानी कथन की भाषा स्पष्ट व सरल होनी चाहिए।
  • कहानी कथन में प्रसंग अनुसार हाव-भाव आरोह अवरोह का प्रयोग करना चाहिए।
  • कहानी कथन के साथ पाठ्य सामग्री का उचित प्रयोग करना चाहिए।
  • कहानी कथन के बाद अधिगमकर्ता से बोधगम्यता के प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए।

(7) निरीक्षण एवं अवलोकन प्रविधि :-

यह तथ्य पूरी तरह से स्थापित है कि देखी हुई घटना वस्तु भूलती नहीं है । इसका प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर स्थाई होता है। शिक्षण करते समय यदि छात्र को पाठ्य विषय में शामिल वस्तुओं एवं घटनाओं के अवलोकन एवं निरीक्षण का अवसर दिया जाए तो शिक्षण अधिगम प्रक्रिया प्रभावशाली होती है।

वास्तव में किसी वस्तु स्थान कार्य का ध्यान पूर्वक निरीक्षण करना ही अवलोकन कहलाता है। सभी विषयों में विशेषकर विज्ञान, कृषि तथा समाज विज्ञान के लिए अधिक उपयोगी मानी जाती है । समझना परखना ही इस विधि का मूल तत्व होता है। समूह शिक्षण एवं शोध कार्यों में इस विधि का प्रयोग प्रभावी ढंग से किया जाता है।

निरीक्षण अवलोकन प्रविधि से शिक्षण करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:-

  • अवलोकन तथा निरीक्षण की प्रक्रिया क्रमबद्ध होनी चाहिए।
  • कब, कहां, किसका, किया और कैसे अवलोकन करना है यह छात्रों को पता होना चाहिए।
  • उद्देश्य का पूर्व निर्धारित होना जरूरी होता है।
  • अवलोकन निरीक्षण के बाद उसकी व्याख्या लेखन के माध्यम से अवश्य करना चाहिए।

(8) उदाहरण विधि :-

किसी कठिन और गूढ़ तथ्य, घटना तथा वस्तु को सामग्री प्रसंगो अनुभव के द्वारा व्यक्त करना उदाहरण कहलाता है । जैसे सरदार भगत सिंह की वीरता, साहस, बलिदान का उदाहरण देकर बच्चों में राष्ट्रीय भावना का विकास आसानी से किया जा सकता है।

एसके कोचर के अनुसार “उदाहरण का अभिप्राय प्रतिमान, चित्र तथा चार्ट आदि वस्तुओं से होता है जो क्लिंष्ट विचारों का वर्णन करती हैं, और उसकी प्रक्रिया में उन पर विशेष प्रकाश डालकर उन्हें आसान बनाते हैं। यह सीखने वालों की भावनाओं कल्पनाओं को प्रेरित करती है । जिससे उनके विचार स्पष्ट होते हैं और वह सही ज्ञान ग्रहण करने योग्य बनते हैं”।

उदाहरण की सहायता से उसका सबसे बड़ा गुण है शिक्षण कार्य जितना ज्यादा उदाहरणों दृष्टांत से समझाया जाएगा। वह संप्रत्यय छात्रों को पूर्णता स्पष्ट हो जाएगा । वहां गलतियों की संभावना कम रहेगी । स्वर संधियों में दीर्घ संधि के अर्थ को हम जितने उदाहरण ,जैसे रामायण विद्यालय, सदाचार तथा आज्ञानुसार आदि से स्पष्ट करेंगे दीर्घ संधि का अर्थ उतना ही ग्रहण योग्य होगा।

उदाहरण विधि का प्रयोग कैसे करें?

  • उदाहरण सरल व स्पष्ट भाषा में होना चाहिए
  • उदाहरणों में विविधता होनी चाहिए
  • उदाहरण पूर्व ज्ञान से संबंधित व रुचिकर होने चाहिए
  • सरल से कठिन ज्ञात से अज्ञात की ओर उन्मुख होना चाहिए
  • उदाहरणों स्तर अनुकूल होने चाहिए

उदाहरण विधि का महत्व तथा उपयोगिता है:-

  • सरलीकरण व स्पष्टता में सहायक होते हैं।
  • बोधगम्यता आसानी से होती है।
  • छात्रों में रुचि पूर्णता को बढ़ाते हैं।
  • अधिगम क्रिया सफल होती है।

(9) खेल विधि :-

खेल एक स्वभाविक प्रक्रिया होती है । इसी के द्वारा बालक अपने को मूल रूप से व्यक्त करता है ।

ह्यूजेज एवं ह्यूजेज के अनुसार :- ” यह विधि जो बालकों को उसी उत्साह से सीखने की क्षमता देती है ,जो उनमें स्वभाविक रूप से पाई जाती है वह कीड़ा विधि या खेल विधि कहलाती है” ।

खेल-खेल में सीखो यह कथन मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है ।
रायबर्न के अनुसार ” यह विधि बालक की रचनात्मक शक्तियों को प्रोत्साहित करती है सामाजिक गुणों को विकसित करके समूह प्रवृत्ति का विकास करती है शारीरिक मानसिक व सामाजिक आध्यात्मिक शक्तियों का विकास कर व्यक्ति को संतुलित करती है”।
खेल विधि में शिक्षण कराते समय हम परिवेश में उपलब्ध सामग्री प्रयोग करें और अभिनय को शामिल करें ।तो शिक्षण जीवन से संबंधित होगा और रुचिकर हो जाएगा।

(10) समूह चर्चा विधि :-

किसी विषय पर एक से अधिक लोगों द्वारा चिंतन व वार्तालाप करने को समूह चर्चा विधिक कहते हैं । इस विधि से शिक्षण करने से सुनने व समझने का कौशल विकसित होता है।
यह विधि अधिगम पर जोर देती है ,और समूह में चर्चा करने से एक ओर जहां खुलकर अभिव्यक्ति का अवसर मिलता है । और वहीं दूसरी ओर विषय भी स्पष्ट होता चला जाता है।
इस विधि में शिक्षक शिक्षार्थी दोनों की समान रूप से सहभागिता एवं सक्रियता रहती है। कक्षागत अनुशासन बना रहता है और तर्क आदि मानसिक क्रियाओं का बारंबार अभ्यास भी हो जाता है।

समूह चर्चा विधि में ध्यान रखने योग्य बातें:-

  • चर्चा का विषय स्पष्ट होना चाहिए
  • चर्चा का माध्यम एक भाषा ही होनी चाहिए
  • चर्चा में छात्रों को छोटे-छोटे समूह में बांट देना
  • अनावश्यक विवाद ना हो शिक्षक इस बात के प्रति जागरूक रहना चाहिए
  • चर्चा के अंत में प्रश्न पूछ कर बोधगम्यता का पता लगाना चाहिए

(11) प्रयोगात्मक विधि:

नाम से ही स्पष्ट होता है जिस विधि में प्रयोग करके सिखाया जाए ,वह शिक्षण की प्रयोगात्मक विधि कहलाती है । इस विधि का आधार वैज्ञानिकता तथा तार्किकता होता है। प्रयोग द्वारा शिक्षण करने से छात्र सक्रिय एवं रहते हैं और स्वयं करके सीखने का अवसर होने से अधिगम स्थायी होता है।
इस विधि में बालक की समस्त इंद्रिय सक्रिय रहती हैं । इसलिए सीखना सरल व सहज हो जाता है।

प्रयोग विधि का उपयोग कैसे किया जाए?

  • वस्तु देखने में कैसी है?
  • वस्तु का रंग कैसा है?
  • वस्तु का आकार कैसा है?
  • स्पर्श करने पर वस्तु कैसी लगती है?
  • वस्तु हल्की है या भारी है?
  • पटकने पर कैसी आवाज आती है?

प्रयोगात्मक विधि के लाभ-

  • प्रयोग विधि से क्रियाशीलता बनी रहती है
  • ज्ञान प्रक्रिया दो तरफा होता है
  • जिज्ञासा पूर्ति में सहायक होता है
  • छात्रों को कल्पना और यथार्थ का अंतर आसानी से पता चल जाता है

(12) वाद-विवाद प्रविधि-

महिलाओं की व्यवसाय में आवश्यकता इस विषय पर एक पक्ष में महिलाओं का व्यवसाय करना जरूरी है ,दूसरा पक्ष नहीं जरूरी है
जब किसी विषय पर चर्चा के लिए दो पक्ष होते हैं। उनके अलग-अलग मत होते हैं, दोनों की चर्चा के बाद निष्कर्ष निकाला जाता है इस विधि को वाद विवाद विधि कहते हैं।Teaching Methods and Techniques

वाद-विवाद प्रविधि का महत्व:-

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रहती है।
  • इसके द्वारा सुननी वह बोलने का कौशल विकसित होता है।
  • तथ्य को स्पष्ट करने में सहायता मिलती है।
  • बालकों की जिज्ञासा शांत होती है नवीन ज्ञान में वृद्धि होती हैं।
  • मानसिक विकास के लिए उपयोगी होता है।माध्यमिक कक्षा से उच्च कक्षा के लिए महत्वपूर्ण होता है।

(13) भ्रमण विधि :-

इस विधि में स्थल, वस्तुओं का ज्ञान घूम-घूम कर प्राप्त किया जाता है । इस विधि को शैक्षणिक भ्रमण भी कहा जाता है। भ्रमण के पश्चात अर्जित की गयी जानकारी व अनुभवों का लेखन अवश्य करवाना चाहिए ताकि ज्ञान स्थायी बना रहे। Teaching Methods and Techniques

भ्रमण विधि से लाभ:-

  • सीखना रुचि को लगता है।
  • बालकों के समस्त इंद्रिय क्रियाशील रहते।
  • सामाजिक भावना का विकास होता है।
  • सीखने में स्वतंत्रता रहती है।
  • विभिन्न संस्कृतियों का ज्ञान सहायता से हो जाता है।

(14) कार्यशाला प्रविधि (वर्कशॉप टेक्निक)

कार्यशाला (Teaching Methods and Techniques) एक निश्चित विषय पर परिचर्चा का प्रयोग इस कार्य होता है । जिसमें सभी प्रतिभागी सदस्य अपने ज्ञान, अनुभव व कौशलों के पारस्परिक आदान प्रदान के द्वारा विषय के बारे में सीखते हैं।

कार्यशाला वह प्रविधि है ,जिसमें छात्र वास्तविक रूप से सक्रिय रहकर कार्य करते हैं। अपने व समूह के सदस्यों के अनुभवों को पारस्परिक आदान प्रदान करके विषय की जानकारी प्राप्त करते हैं । छात्र इसमें सक्रिय प्रतिभा करता है। इस विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान स्थायी,विश्वसनीय तथा उपयोगी होता है । इस प्रविधि का प्रयोग छात्रों के क्रियात्मक पक्ष के विकास के लिए किया जाता है । इसमें प्रायोगिक कार्य द्वारा ज्ञानार्जुन को अधिक महत्व दिया जाता है।

उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि समस्त शिक्षण विधियों का अपना विशेष स्थान होता है । शिक्षक पर यह महत्वपूर्ण दायित्व होता है । कि वह विषय छात्र स्तर संसाधनों के अनुसार विधियों का शिक्षण में अनुप्रयोग करें और अधिगम की गुणवत्ता में उत्तरोत्तर सुधार का लक्ष्य प्राप्त करें। Teaching Methods and Techniques