दल शिक्षण विधि क्या है? (Team Teaching )

दल शिक्षण (team teaching ), दल शिक्षण विधि क्या है?

दल शिक्षण किसी एक शिक्षक के द्वारा न करके एक से अधिक शिक्षकों द्वारा मिलजुल कर किया जाता है। और शिक्षण के निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। वर्तमान समय में शिक्षक का उत्तरदायित्व बहुत अधिक बढ़ गया है । साथ ही छात्रों को भी दबाव पूर्ण स्थितियों में कार्य करना पड़ता है । तो ऐसे में समूह शिक्षण प्रयोग करने की आवश्यकता उभरकर सामने आती है । अतः दल शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

दल शिक्षण की अवधारणा एवं परिभाषाएं :-

दल शिक्षण विधि क्या है? शिक्षक प्रशिक्षण संस्थाओं में संसाधनों विशेषज्ञों का अधिकतम उपयोग करने के लिए समूह शिक्षण मुख्य नवाचार है। इसमें शिक्षण संस्था के सभी सदस्यों का अधिकतम एवं कुशलता में उपयोग किया जा सकता है।

दल शिक्षण एक व्यवस्था है, जिसमें समूह के शिक्षक अपनी क्रियाओं को स्वयं निर्धारित करते हैं। उन्हें कार्य के चयन की पूर्ण स्वतंत्रता होती है । प्रत्येक शिक्षक अपने कौशल व्यक्तित्व अनुभव तथा विशेष योग्यताओं का प्रयोग करने का प्रयास करता है । इसके अंतर्गत विद्यालय सुविधाओं का भी अधिक से अधिक प्रयोग करने का प्रयास किया जाता है।

दल शिक्षण व्यवस्था का वह स्वरूप है जिसमें दो या दो से अधिक शिक्षक अपने स्रोतों, अभिरुचि और छात्रों की आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षण अधिगम संपन्न करते हैं तथा वे विद्यालय की सुविधाओं का समुचित उपयोग करते हैं।

दल शिक्षण परंपरागत शिक्षण के स्थान पर एक ऐसा नवाचार है जिसमें शिक्षण में सुधार लाने एवं गुणात्मक ताकि वृद्धि के लिए एक ही कक्षा में कई शिक्षक मिलकर शिक्षण कार्य करते हैं।

दल शिक्षण के उद्देश्य :-

  • शिक्षकों की उपलब्ध संख्या में से विशेषज्ञों का सर्वोत्तम उपयोग करना ।
  • एक से अधिक व्यक्तियों के कौशलों का उपयोग करते हुए शिक्षण की गुणवत्ता को बढ़ाना।
  • शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में सहयोग तथा दल में परस्पर धनात्मक दृष्टिकोण का विकास करना ।
  • प्रशिक्षक, विद्यार्थी-शिक्षकों की विशेष विषयवस्तु से संबंधित आवश्यकताओं को संतुष्ट करने एवं उससे संबंधित कठिनाइयों को दूर करने में सामूहिक सहायता प्रदान करते हैं
  • शिक्षण तथा मूल्यांकन में सामूहिक जिम्मेदारी से संबंधित भावना का विकास करना ।
  • विद्यार्थी शिक्षकों में समूह में अध्ययन अध्यापन की आदतें विकसित करना ।

दल शिक्षण के प्रकार :-

जब दो या दो से अधिक शिक्षक मिलकर शिक्षण करते हैं । तो वह चार प्रकार से संयोजित हो सकते हैं। इसी आधार पर दल शिक्षण को निम्नलिखित चार प्रकारों में विभाजित किया गया है।

  1. एक ही कक्षा में कालांश हेतु दल शिक्षण
  2. योग्यता व कौशल आधारित दल
  3. विशेषज्ञता आधारित दल शिक्षण
  4. श्रृंखलाबद्ध तंत्र आधारित दल

एक ही कक्षाकक्ष में कालांश हेतु शिक्षण :- इस प्रकार के दल शिक्षण में दल के सदस्य एक ही प्रकार के विभिन्न पक्षों को एक ही कक्षा कक्ष में एवं एक ही कालांश में चर्चा करते हैं । तथा इन पक्षों में प्रत्येक अपनी विशेषज्ञता के विशेष ज्ञान को जोड़ते हुए आपस में आदान-प्रदान करते हैं।

योग्यता व कौशल आधारित दल शिक्षण :- इस प्रकार के दल शिक्षण में विभिन्न शिक्षकों द्वारा इकाइयों का आवंटन विषय वस्तु आधारित न होकर विशेष क्षमता,कौशल आधारित होती है । जैसे व्याख्यान, प्रदर्शन, निर्देशन, चर्चा आदि। एक अध्यापक व्याख्या से शिक्षण करता है तो दूसरा प्रदर्शन द्वारा हुआ तीसरा प्रोजेक्ट शिक्षण में आता है।

विशेष आधारित दल शिक्षण :- विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ युक्त शिक्षक पाठ्य निर्माण में मूल्यांकन तक संयुक्त रुप से जिम्मेदारियों के लिए निर्देशित होते हैं । वह अपनी विशेषज्ञता एवं क्षेत्रों के आधार पर विषय वस्तु का आदान प्रदान करते हैं।

श्रृंखलाबद्ध तंत्रआधारित दल शिक्षण :- इसमें एक शिक्षक अनुदेशनात्मक प्रक्रिया को प्रारंभ करता है। जब वह पूर्ण कर लेता है तो दूसरा उसका अनुसरण करता है एवं यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। यहां पर कौशल अथवा विशेष क्षमता आधारित कार्यों का आवंटन नहीं होता है । प्रत्येक शिक्षक दूसरे के लिए किए गए कार्यों में सहायक, संवर्धन तथा पूरक कार्य करता है।

दल शिक्षण के सिद्धांत:-

कक्षा के आकार तथा संरचना का सिद्धांत – दल शिक्षण के उद्देश्य तथा कुछ विषयों में विद्यार्थियों की कठिनाई को दूर करने के उद्देश्य से कक्षा का आकार होना आवश्यक है आवश्यक है कि अधिगम स्थिति की आवश्यकता के अनुसार समूह, आकार व स्थान हो।

शिक्षकों को उनके दायित्व का प्रदत करने का सिद्धांत :- शिक्षकों के कर्तव्य उनकी दक्षताओं के अनुसार सटीक होने चाहिए तथा दायित्व उनके विषय व विशेष रूचि से संबंधित होना चाहिए।

अधिगम अधिगम वातावरण का सिद्धांत :- सटीक शिक्षण सहायक सामग्री तथा अन्य विधाओं का उपयोग करते हुए अधिगम वातावरण का निर्माण करना चाहिए । समग्र वातावरण का समुचित उपयोग करने का दायित्व शिक्षक का होता है । जैसे कक्षा कक्ष प्रयोगशाला में पुस्तकालय आदि सभी का उपयोग होना चाहिए।

समय तत्व का सिद्धांत :- उक्त प्रकरणों पाठ के प्रमुख व्याख्यान तथा समूह कार्य के अनुरूप समय का निर्धारण होना चाहिए था। एक लचीली समय सारणी आवश्यक है तथा सभी पाठकों ने एक समय अधिक होने चाहिए।
समय तत्व का सिद्धांत :- एक लचीली समय सारणी आवश्यक है तथा सभी पाठ एक निश्चित समय अवधि के भीतर होने चाहिए।

पर्यवेक्षक का सिद्धांत :- दल शिक्षण का उद्देश्य विशेषज्ञ शिक्षकों का उपयोग करते हुए विषय सामग्री का विकास हुआ प्रस्तुति करना है। अतः एक प्रकरण के ज्ञान के विभिन्न पदों को आत्मसात करने के लिए पर्यवेक्षक व मूल्यांकन भी आवश्यक है । जो भी कार्य सदस्य द्वारा किया जा रहा है वह कैसे और किस रूप में किया जा रहा है तथा विद्यार्थी कितना सीख रहा है। आदि सभी तथ्यों एवं पदों का मूल्यांकन करते रहने से ही दल शिक्षण को उचित दिशा मिल सकती है।

निर्देशन के स्तर का सिद्धांत :- समूह के विद्यार्थी शिक्षकों के प्रारंभिक व्यवहार निश्चित होने चाहिए अतः शिक्षण के प्रत्येक सदस्यों का प्रस्तुतीकरण कक्षा कक्ष में सामंजस्य से युक्त होना चाहिए।

दल शिक्षण के लाभ:-

  • विद्यार्थियों को खुली चर्चा करने का अवसर प्रदान किया जाता है।
  • उचित मानवीय संबंध एवं सहयोग दृष्टिकोण बनाने में सहायक है।
  • समय और शक्ति की बचत में सहायक है विशेषज्ञों का लाभ मिलता है जिससे अधिगम एवं शिक्षण दोनों का स्तर ऊंचा उड़ता है।
  • उचित अनुशासन स्थापित करने में सहायक है. उचित पर्यवेक्षण में सहायक है।

दल शिक्षण की सीमाएं :-

  • विद्यालयों में भौतिक संसाधनों की कमी की समस्या
  • आर्थिक दृष्टि से खर्चीला
  • परंपरागत रूढ़िवादी अभिवृत्ति
  • अनेकता में एकता स्थापित करने में कठिनाई
  • उत्तरदायित्व के विभाजन में कठिनाई
  • शिक्षकों में प्रतियोगिता एवं सहयोग का अभाव
  • संरचना में लचीलापन आवश्यक है
  • दल शिक्षण विधि क्या है

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