गिद्ध संरक्षण प्रोजेक्ट , 2004

गिद्ध संरक्षण प्रोजेक्ट या गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र, पिंजौर

गिद्ध यह पक्षियों कि एक पीड़ित प्रजाति है। जिसे पूर्व काल में जटायू के नाम से जाना जाता है। गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है जोकि अपने भोजन के लिये केवल मृत पशुओं के शरीर पर निर्भर रहता है। इस प्रकार से गिद्ध वातावरण के लिये कुशल एवं प्राकृतिक सफाई कर्मी का कार्य करता ह गिद्धों का पाचनतंत्र मजबूत होता है। जिससे कि यह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा गला माँस भी पचा सकते हैं। इस प्रकार गिद्ध वास्तव में अनेक संक्रामक रोगों का विस्तार रोकते हैं।

वर्ष 2004 में देश के पहले ‘गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र’ की स्थापना की गई। यह केंद्र एशिया का पहला ऐसा केंद्र है जोकि लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में प्रमुख योगदान करता है ।

गिद्ध संरक्षण परियोजना 2004
गिद्ध संरक्षण परियोजना 2004

गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट के मद्देनजर उनके संरक्षण एवं अभिवृद्धि के लिए हरियाणा वन विभाग तथा मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के बीच एक मेमोरेंडम आफ अंडरस्टैंडिंग सन 2006 में हस्ताक्षर हुए थे इसमें कहा गया था कि भारत में अधिकांश गिद्धों की मृत्यु पशुओं को दी जाने वाली डिक्लोफेनेक (Diclofenac) तथा नॉन स्टीरोइडल एंटी इनफ्लीमेटरी (anti-inflammatory)! ड्रग के उपयोग के कारण होती है ।

गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र सरकार (VCBC) हरियाणा वन विभाग और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) की एक संयुक्त परियोजना है। यह तीन प्रजातियों के गिद्धों (सफेद पीठ वाले गिद्ध, लंबे चोंच वाले गिद्ध, और पतले चोंच वाले गिद्ध) को विलुप्त होने से बचाने के लिए एक सहयोगात्मक पहल है।

यह केंद्र जोधपुर गांव में हरियाणा वन विभाग की भूमि पर 5 एकड़ में फैला हुआ है। गिद्धों की नौ प्रजातियाँ भारत की स्थानिक हैं, परंतु अधिकांश पर विलुप्त होने का खतरा है। गिद्ध संरक्षण प्रोजेक्ट

आईयूसीएन के अनुसार गिद्धों की नौ प्रजातियों की स्थिति निम्न है- भारत में नौ गिद्ध प्रजातियाँ पाई जाती है :-

  • सफेद पीठ वाले गिद्ध
  • गोपर गगिद्
  • श्याम गिद्ध
  • पांडुर गिद्ध
  • आर्गुल गिद्ध
  • दीर्घचुंच गिद्ध
  • दीर्घचुंच गिद्ध
  • यूरेसियन पांडुर गिद्ध
  • राज गिद्ध

गिद्ध संरक्षण से सम्बन्धित प्रमुख बिंदु

वर्तमान में गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र में गिद्धों की तीन प्रजातियों व्हाइट-बैक्ड (White– backed), लॉन्ग-बिल्ड (long-billed) और स्लेंडर-बिल्ड (Slender–billed) का सरंक्षण किया जा रहा है।

गुजरात में गिद्धों की संख्या बढ़ी तादाद में पाई जाती थी परंतु वर्तमान समय में हरियाणा में गिद्धों की संख्या मात्र 1400 के आसपास रह गई है। गिद्ध संरक्षण प्रोजेक्ट

• इस समय देश में नौ गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र हैं।

• पर्यावरण व प्रकृति के संतुलन में गिद्धों की बड़ी भूमिका होती है। पुरातन काल से गिद्ध मरे हुए जानवरों के अवशेषों को खाकर इस पृथ्वी पर से पड़ी गंदगी को खत्म करते रहे हैं जिससे कि बहुत सी बीमारियों व संक्रमण से बचाव होता है।

• भारत सरकार की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पशुओं के दर्द निवारक दवा तथा डिक्लोफेनाक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है ।

• 3 जून 2016 को हरियाणा के पंचकुला जिले के पिंजौर से एशिया के पहले जिप्स युद्ध पुनरुद्धार कार्यक्रम (Gyps Vulture Reintroction Programme) से किया गया है ।

• गिद्धों की मौत के कारणों पर अध्ययन करने के लिये वर्ष 2001 में हरियाणा के पिंजौर में एक गिद्ध देखभाल केंद्र (Vulture Care Centre-VCC) स्थापित किया गया।

• यहां पर बीमार पक्षियों की श्रेणी वाले दो हिमालयन ग्रिफोन (Himalayan Griffons) के साथ-साथ 8 सफेद पीठ वाले गिद्धों सहित कुल 10 गिद्धों को रखा गया है।

• इन सभी गिद्धों के पीठ पर डमी सैटेलाइट ट्रांसमीटर (Dummy Satellite Transmitter) लगाया गया है।

• इसी के साथ जानवरों को दी जाने वाली दर्द निवारक औषधि डिक्लोफेनाक , जो कि गिद्धों की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण होती है, इस दवाई का उपयोग इस केंद्र के 100 किलोमीटर क्षेत्र के आसपास नहीं किया जाएगा।

• गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्रों का उद्देश्य न केवल गिद्धों की देखभाल करना व उनका संरक्षण करना है ।

• इन केंद्रों का पहला उद्देश्य गिद्धों की लुप्तप्राय तीन प्रजातियों के गिद्धों की संख्या में वृद्धि करना है ।

भारत के संरक्षण प्रयासों में मुख्य फोकस आईयूसीएन की गंभीर संकटग्रस्त सूची में शामिल गिद्धों की तीन प्रजातियाँ हैं, जो निम्नलिखित हैं-

a. व्हाइट-बैक्ड वल्चर (Whilte-backed Vulture)1

b. स्लेंडर-बिल्ड वल्चर (Slender-billed vulture)

c. लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (long-billed vulture)

गिद्धों के संकट के क्या कारण थे ?

• गिद्धों की संख्या में गिरावट का प्रमुख कारण डिक्लोफिनेक (Diclofenac) दवा है, जो पशुओं के शवों को खाते समय गिद्धों के शरीर में पहुँच जाती है।

• पशुचिकित्सा में प्रयोग की जाने वाली दवा डिक्लोफिनेक को वर्ष 2008 में प्रतिबंधित कर दिया गया। इसका प्रयोग मुख्यत: पशुओं में बुखार/सूजन/उत्तेजन की समस्या से निपटने में किया जाता था।

• डिक्लोफिनेक दवा के जैव संचयन से गिद्धों के गुर्दे (Kidney) काम करना बंद कर देते हैं जिससे उनकी मौत हो जाती है।

• डिक्लोफिनेक दवा गिद्धों के लिये प्राणघातक साबित हुई।

गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र

(A) गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र हरियाणा वन विभाग तथा बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी का एक संयुक्त कार्यक्रम है।

(B) गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र को वर्ष 2001 में स्थापित गिद्ध देखभाल केंद्र के नाम से जाना जाता था।

(C) वर्ष 2004 में गिद्ध देखभाल केंद्र के उन्नत संस्करण के रूप में गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र की स्थापना की गई।

भारत में डाईक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध :-

देश में डाईक्लोफेनाक का पशु चिकित्सा के लिए उपयोग पर प्रतिबंध प्राप्त करने में केन्द्र ने एक महत्वमपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह पूर्व वन मंत्री, सुश्री किरण चौधरी द्वारा उठाए गए प्रयासों से संभव हुआ। भारत के औषधि महानियंत्रक ने पशु चिकित्सा उपयोग के लिए डाईक्लोफेनाक का निर्माण करने के लिए प्रदान लाइसेंस वापस लेने के लिए सभी राज्य औषधि नियंत्रकों को, 11 मई, 2006 को निर्देश दिए।

  • 2019 में उत्तर प्रदेश सरकार ने महराजगंज जिले में राज्य के पहले गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र (State’s first vulture conservation and breeding centre) स्थापित करने का निर्णय लिया है।
  • यह केंद्र हरियाणा के पिंजौर में स्थापित देश के पहले जटायु संरक्षण और प्रजनन केंद्र की तर्ज पर विकसित किया जाएगा।